Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1506

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- त्र्यरुणस्त्रैवृष्णः, त्रसदस्युः पौरुकुत्सः Chhand- ऊर्ध्वा बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
त्वे꣡ सो꣢म प्रथ꣣मा꣢ वृ꣣क्त꣡ब꣢र्हिषो म꣣हे꣡ वाजा꣢꣯य श्र꣡व꣢से꣣ धि꣡यं꣢ दधुः । स꣡ त्वं नो꣢꣯ वीर वी꣣꣬र्या꣢꣯य चोदय ॥१५०६॥

त्वे꣡इति꣢ । सो꣣म । प्रथमाः꣢ । वृ꣣क्त꣢ब꣢र्हिषः । वृ꣣क्त꣢ । ब꣣र्हिषः । महे꣢ । वा꣡जा꣢꣯य । श्र꣡व꣢꣯से । धि꣡य꣢꣯म् । द꣣धुः । सः꣢ । त्वम् । नः꣣ । वीर । वीर्या꣢य । चो꣣दय ॥१५०६॥

Mantra without Swara
त्वे सोम प्रथमा वृक्तबर्हिषो महे वाजाय श्रवसे धियं दधुः । स त्वं नो वीर वीर्याय चोदय ॥

त्वेइति । सोम । प्रथमाः । वृक्तबर्हिषः । वृक्त । बर्हिषः । महे । वाजाय । श्रवसे । धियम् । दधुः । सः । त्वम् । नः । वीर । वीर्याय । चोदय ॥१५०६॥

Samveda - Mantra Number : 1506
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 14; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (सोम) = सब ऐश्वर्यों को जन्म देनेवाले प्रभो ! (प्रथमाः) = [प्रथ विस्तारे] अपना विस्तार करनेवाले, हृदय की संकुचितता [Narrowness] को अपने से दूर करनेवाले, (वृक्तबर्हिषः) = अपने हृदय से कृपणता [meanness] के घास-फूँस [बर्हि] को उखाड़ देनेवाले [वृक्त] –घास-फूस को उखाड़कर अपने हृदयान्तरिक्ष को पवित्र बनानेवाले लोग – (त्वे) = आपमें ही (धियं दधुः) = अपनी बुद्धियों को धारण करते हैं, अर्थात् सदा आपका ही चिन्तन करते हैं, जिससे १. (महे) = ये अपने हृदय को महान् बना पाएँ। प्रभु के स्मरण से प्राणिमात्र के प्रति बन्धुत्व उत्पन्न होता है और हम अपने में ही रमे नहीं रह जाते— हममें सभी के हित की भावना उत्पन्न होती है २. (वाजाय) = वाज के लिए वे आपमें अपनी बुद्धियों को धारण करते हैं। आपके चिन्तन से त्याग की भावना उत्पन्न होती है, शक्ति मिलती है और आवश्यक धन भी प्राप्त होता है । ३. (श्रवसे) = ये 'प्रथम-वृक्तबर्हिष्' इसलिए भी आपका चिन्तन करते हैं कि इनका जीवन यशस्वी हो [glory ], इन्हें धन की प्राप्ति हो [wealth], सदा इनका जीवन-स्तोत्रमय बन जाए [hymn] और इनके हाथों से सदा प्रशस्त कर्म ही होते रहें [praiseworthy action]।

ये ‘प्रथम’ लोग प्रभु से प्रार्थना करते हैं कि (सः त्वं वीर) = वे आप वीर प्रभु - हमारे सब कामक्रोधादि शत्रुओं को कम्पित करके दूर भगा देनेवाले प्रभो [वि + ईर] ! (न:) = हमें (वीर्याय) = शक्तियुक्त कर्मों के लिए (चोदय) = प्रेरित कीजिए | हम 'निर्वीर्य' न हो जाएँ - हमारा जीवन आराम-पसन्द न हो जाए। हम कामादि शत्रुओं को दूर भगानेवाले हों- ये शत्रु हमसे भयभीत हों । हम ' त्रसदस्यु' बनें और इस प्रकार इस मन्त्र के ऋषि हो सकें ।
Subject
महत्त्व, वाज व श्रवस्