Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 150

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- श्रुतकक्षः सुकक्षो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
उ꣡प꣢ नो꣣ ह꣡रि꣢भिः सु꣣तं꣢ या꣣हि꣡ म꣢दानां पते । उ꣡प꣢ नो꣣ ह꣡रि꣢भिः सु꣣त꣢म् ॥१५०॥

उ꣡प꣢꣯ । नः꣣ । ह꣡रि꣢꣯भिः । सु꣣त꣢म् । या꣣हि꣢ । म꣣दानाम् । पते । उ꣡प꣢꣯ । नः꣣ । ह꣡रि꣢꣯भिः । सु꣣त꣢म् ॥१५०॥

Mantra without Swara
उप नो हरिभिः सुतं याहि मदानां पते । उप नो हरिभिः सुतम् ॥

उप । नः । हरिभिः । सुतम् । याहि । मदानाम् । पते । उप । नः । हरिभिः । सुतम् ॥१५०॥

Samveda - Mantra Number : 150
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(नाना मद) = इस संसार में मानव को कितने ही मद- हर्ष प्राप्त हैं । १. मनुष्य का शरीर स्वस्थ हो, तो उसे जो हर्ष प्राप्त होता है, उसे 'तन्दुरुस्ती हज़ार नियामत है' इस लोकोक्ति में प्रतिक्षिप्त हुआ देख सकते हैं। २. कोई इन्द्रिय किसी भी विषयपङद्म से लिप्त न हो तो उस समय इस निर्मल इन्द्रियवाले पुरुष के चेहरे पर विद्यमान सतत स्मित उसके हर्ष की सूचना देती है। ३. सत्य से पवित्र हुए हुए मन में एक विशेष प्रकार का ही उल्लास होता है। ४. ज्ञान की वृद्धि के साथ दीप्त होता हुआ विज्ञानमयकोश एक अद्भुत आनन्द का कारण बनता है। ५. जिस समय हम अज्ञानियों से किये जा रहे अपमानों से क्षुब्ध नहीं होते, उस समय वह सहनशक्ति का बल हमें आनन्द की सीमा पर पहुँचा देता है । ६. इन सब आन्तरिक आनन्दों के साथ बाह्य धन व सम्पत्ति का भी आनन्द है जो मनुष्य को घृतलवण-तण्डुलेन्धन की चिन्ता से मुक्त-सा किये रखता है।

(मदों के पति) = इन सब हर्षों के स्वामी प्रभु हैं। उन्हें सम्बोधित करते हैं कि (मदानां पते) = हे मदों के स्वामिन्! आपकी कृपा से ही हम इस जीवन में इन हर्षों को प्राप्त कर पाते हैं। हम इन मदों को प्राप्त कर सकें, अतः (हरिभिः) = इन इन्द्रियरूप घोड़ों के उद्देश्य से आप (नः) = हमें (सुतम्) = शक्ति [सोम सुत] (उपयाहि) = प्राप्त कराइए । भोजन से उत्पन्न वीर्यशक्ति का अपव्यय हम क्षणिक आनन्द के लिए न कर डालें। वीर्य का पान शरीर में होगा तो वह वीर्य अङ्ग-प्रत्यङ्ग को शक्तिशाली बनाएगा। =

यज्ञों में इस प्रकार जब हमारी इन्द्रियाँ इस सोमपान के द्वारा शक्तिशाली बनें तो हे प्रभो! आप नः=हमें हरिभिः = इन्द्रियों के द्वारा सुतम् यज्ञ को उपयाहि = = प्राप्त कराइए । शक्तिशाली बनी हुई हमारी इन्द्रियाँ यज्ञों में प्रवृत्त हों।

वस्तुतः मनुष्य का जीवन हर्ष से ओत-प्रोत तभी हो सकता है जबकि १. उसकी इन्द्रियाँ शक्तिशाली हों और २. शक्तिसम्पन्न इन्द्रियाँ यज्ञों में प्रवृत्त हो जोएँ ।

ऐसा वही व्यक्ति हो सकता है जो 'श्रुतकक्ष' - ज्ञान को अपनी शरण बनाता है। इस ज्ञानरूप कवच को धारण करनेवाला 'सु - कक्ष' = उत्तम रक्षण स्थानवाला है। इस प्रकार इसकी इन्द्रियाँ आसुर भावनाओं से अनाक्रान्त रहकर इसे 'आङ्गिरस'= शक्तिसम्पन्न अङ्गोंवाला बनाती हैं। यही श्रुतकक्ष - सुकक्ष- आङ्गिरस इस मन्त्र का ऋषि है।
Essence
हम अपनी इन्द्रियों को वीर्य - रक्षा के द्वारा शक्तिशाली बनाएँ और उन सशक्त इन्द्रियों से यज्ञों में प्रवृत्त हों।
Subject
यज्ञमय जीवन का प्रारम्भ