Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 15

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- शुनः शेप आजीगर्तिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
ज꣡रा꣢बोध꣣ त꣡द्वि꣢विड्ढि वि꣣शे꣡वि꣢शे य꣣ज्ञि꣡या꣢य । स्तो꣡म꣢ꣳ रु꣣द्रा꣡य꣢ दृशी꣣क꣢म् ॥१५

ज꣡रा꣢꣯बोध । ज꣡रा꣢꣯ । बो꣣ध । त꣢त् । वि꣣विड्ढि । विशे꣡वि꣢शे । वि꣣शे꣢ । वि꣣शे । यज्ञि꣡या꣢य । स्तो꣡म꣢꣯म् । रु꣣द्रा꣡य꣢ । दृ꣣शीक꣢म् ॥१५॥

Mantra without Swara
जराबोध तद्विविड्ढि विशेविशे यज्ञियाय । स्तोमꣳ रुद्राय दृशीकम् ॥१५

जराबोध । जरा । बोध । तत् । विविड्ढि । विशेविशे । विशे । विशे । यज्ञियाय । स्तोमम् । रुद्राय । दृशीकम् ॥१५॥

Samveda - Mantra Number : 15
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रभु जीव से कहते हैं कि (जराबोध)= जरा - बुढ़ापा, उसमें बुध्यते - जो चेतता है, अर्थात्
यौवन के नशे में मनुष्य की बुद्धि विलुप्त हो जाती है, मानव जीवन का लक्ष्य भूल जाने से वह पथ - भ्रष्ट हो जाता है। प्रायः शक्तियों के जीर्ण हो जाने पर - जरावस्था आने पर उसे होश आता है, परन्तु इस प्रकार तो सब जीवन ही व्यर्थ चला जाता है, अतः प्रभु कहते हैं कि हे जराबोध! (विशेविशे)= प्रत्येक प्राणी में (यज्ञियाय)= सङ्गतिकरण में - सम्पर्क में श्रेष्ठ उस (रुद्राय)=क्रियात्मक उपदेश देनेवाले प्रभु के लिए [रुत्+र] (तत्)='तनु विस्तारे' विस्तृत (दृशीकम्)= जो आँखो से दिखे [visible] नकि केवल वाणी से बोला जाए, ऐसे (स्तोमम्)= स्तोत्र को-स्तुतिसमूह को (विविडि)= व्याप्त कर।
प्रभु प्रत्येक प्राणी में व्याप्त है। किसी से उन्हें घृणा नहीं है और इस प्रकार जीव को भी वे क्रियात्मक उपदेश दे रहे हैं कि मेरी स्तुति का प्रकार यही है कि तेरा सम्पर्क भी अधिक-से-अधिक प्राणियों से हो । Greatest good of the greatest number – (यद्भूतहित मत्यन्तम्)= अधिक-से-अधिक प्राणियों का हित करना ही तेरा लक्ष्य हो।

इसी उद्देश्य से तेरे सारे कर्म चलें। ये तेरे कर्म ही वस्तुतः उस प्रभु की दृश्य स्तुति होंगे। इसी मार्ग से चलकर ही हम वास्तविक सुख का [शुन:] निर्माण करनेवाले [शेप:] इस मन्त्र के ऋषि ‘शुन:शेप' बनेंगे।
Essence
प्रभु का अर्चन लोकहित के कर्मों द्वारा होता है, ('स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य'), कर्म ही उसके ‘दृशीक स्तोम' हैं।
Subject
दीखनेवाली स्तुति