Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1498

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
वि꣣भक्ता꣡सि꣢ चित्रभानो꣣ सि꣡न्धो꣢रू꣣र्मा꣡ उ꣢पा꣣क꣢ आ । स꣣द्यो꣢ दा꣣शु꣡षे꣢ क्षरसि ॥१४९८॥

वि꣣भक्ता꣢ । वि꣣ । भक्ता꣢ । अ꣡सि । चित्रभानो । चित्र । भानो । सि꣡न्धोः꣢꣯ । ऊ꣣र्मौ꣢ । उ꣣पाके꣢ । आ । स꣣द्यः꣢ । स꣣ । द्यः꣢ । दा꣣शु꣡षे꣢ । क्ष꣣रसि ॥१४९८॥

Mantra without Swara
विभक्तासि चित्रभानो सिन्धोरूर्मा उपाक आ । सद्यो दाशुषे क्षरसि ॥

विभक्ता । वि । भक्ता । असि । चित्रभानो । चित्र । भानो । सिन्धोः । ऊर्मौ । उपाके । आ । सद्यः । स । द्यः । दाशुषे । क्षरसि ॥१४९८॥

Samveda - Mantra Number : 1498
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 14; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (चित्रभानो) = अद्भुत दीप्तिवाले प्रभो! आप क्या तो (सिन्धोः ऊर्मा) = समुद्र की लहरों में - अर्थात् घर से दूर विदेश में समुद्रपार स्थित दाश्वान् को और क्या (उपाके) = बिल्कुल समीप में स्थित [in the neighbourhood] दाश्वान् को (आ) = सर्वथा (विभक्ता असि) = उचित धनों में भागी बनानेवाले हैं । (दाशुषे) = इस दाश्वान् के लिए - आपके प्रति अपना समर्पण करनेवाले दानी [दाश् दाने] के लिए (सद्य) = शीघ्र ही (क्षरसि) = आवश्यक धनों को देते हैं। प्रभु का भक्त - लोकहित के लिए अपना तन-मन-धन देनेवाला दाश्वान् कभी भूखा नहीं मरता । 'दाश्वान्' लोकहित के लिए देता है और प्रभु दाश्वान् को देते हैं । ' Spend and God will send' इस लोकहित की मूल भावना यही तो है । दाश्वान् घर पर हो, समुद्र पार गया हो, कहीं भी हो प्रभु उसकी आवश्यकताएँ पूरी करते ही हैं । एवं, परार्थ के द्वारा यह दाश्वान् स्वार्थ को सिद्ध करता है और सुखी व शान्त जीवनवाला बनकर प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि 'शुन: शेप' होता है ।
Essence
हम दें – प्रभु हमें देंगे ।
Subject
‘दाश्वान्' को देनेवाले प्रभु हैं