Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1496

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- त्र्यरुणस्त्रैवृष्णः, त्रसदस्युः पौरुकुत्सः Chhand- ऊर्ध्वा बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
अ꣢ध꣣ य꣢दि꣣मे꣡ प꣢वमान꣣ रो꣡द꣢सी इ꣣मा꣢ च꣣ वि꣢श्वा꣣ भु꣡व꣢ना꣣भि꣢ म꣣ज्म꣡ना꣢ । यू꣣थे꣢꣫ न नि꣣ष्ठा꣡ वृ꣢ष꣣भो꣡ वि रा꣢꣯जसि ॥१४९६॥

अ꣡ध꣢꣯ । यत् । इ꣣मे꣢इति꣢ । प꣣वमान । रो꣡द꣢꣯सी꣣इ꣡ति꣢ । इ꣣मा꣢ । च꣣ । वि꣡श्वा꣢꣯ । भु꣡व꣢꣯ना । अ꣣भि꣢ । म꣣ज्म꣡ना꣢ । यू꣣थे꣢ । न । नि꣣ष्ठाः꣢ । निः꣣ । स्थाः꣢ । वृ꣣षभः꣢ । वि । रा꣣जसि ॥१४९६॥

Mantra without Swara
अध यदिमे पवमान रोदसी इमा च विश्वा भुवनाभि मज्मना । यूथे न निष्ठा वृषभो वि राजसि ॥

अध । यत् । इमेइति । पवमान । रोदसीइति । इमा । च । विश्वा । भुवना । अभि । मज्मना । यूथे । न । निष्ठाः । निः । स्थाः । वृषभः । वि । राजसि ॥१४९६॥

Samveda - Mantra Number : 1496
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 14; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
यह ‘त्रसदस्यु' प्रभु की दिव्य कान्तियों का दर्शन व स्तवन करता हुआ सभी लोक-लोकान्तरों में अधिष्ठातृरूपेण स्थित प्रभु को देखता है और कह उठता है कि - (अध) = अब (यत्) = जो (इमे रोदसी) = ये द्युलोक व पृथिवीलोक हैं, (च) = तथा (इमा विश्वा भुवना) = ये सम्पूर्ण लोक-लोकान्तर हैं हे (पवमान) = सबको गति देने व पवित्र करनेवाले प्रभो ! आप (मज्मना) = [नि० २.९ मज्मना इति बलनाम] अपनी शक्ति से इन सबपर (अभिविराजसि) = चारों ओर शोभायमान हो रहे हैं । आपने अपनी शक्ति से इन सबको अधिष्ठित किया हुआ है । इन लोक-लोकान्तरों पर अधिष्ठित आप इस प्रकार शोभायमान हो रहे हैं (न) = जैसे (यूथे) = गौवों के झुण्ड में (निष्ठा) = निश्चितरूप से स्थित (वृषभ:) = वृषभ शोभायमान होता है । सब लोकों का उपादानकारण महत्तत्त्व परमेश्वर से अधिष्ठित है । परमेश्वर से अधिष्ठित प्रकृति ही सचराचर संसार को जन्म देती है। प्रभु लोकों को जन्म देते हैं और फिर उन लोकों की रक्षा भी करते हैं । वृषभ गौवों के झुण्ड में दोनों ही कार्यों को करता है ।

परमेश्वर से अधिष्ठित ये लोक ठीक गति में रहते हैं तथा इनकी पवित्रता बनी रहती है। जीव जितने अंश में विद्रोह करके स्वतन्त्र होना चाहता है, उतने ही अंश में वह उच्छृंखल होकर अपवित्र हो जाता है। ‘त्रसदस्यु' अपने को प्रभु से अधिष्ठितरूप में ही चाहता है और इसी से वह वासनाओं का शिकार नहीं होता ।
Essence
हम सब लोक-लोकान्तरों के अधिष्ठिाता प्रभु की महिमा व शोभा को देखें और अपने जीवनों को पवित्र बनाएँ ।
Subject
गौवों में वृषभ के समान