Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1491

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- प्रियमेध आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इ꣡न्द्रा꣢य꣣ गा꣡व꣢ आ꣣शि꣡रं꣢ दुदु꣣ह्रे꣢ व꣣ज्रि꣢णे꣣ म꣡धु꣢ । य꣡त्सी꣢मुपह्व꣣रे꣢ वि꣣द꣢त् ॥१४९१॥

इ꣡न्द्रा꣢꣯य । गा꣡वः꣢꣯ । आ꣣शि꣡र꣢म् । आ꣣ । शि꣡र꣢꣯म् । दु꣣दु꣢ह्रे । व꣣ज्रि꣡णे꣢ । म꣡धु꣢꣯ । यत् । सी꣣म् । उपह्वरे꣢ । उ꣣प । ह्वरे꣢ । वि꣣द꣢त् ॥१४९१॥

Mantra without Swara
इन्द्राय गाव आशिरं दुदुह्रे वज्रिणे मधु । यत्सीमुपह्वरे विदत् ॥

इन्द्राय । गावः । आशिरम् । आ । शिरम् । दुदुह्रे । वज्रिणे । मधु । यत् । सीम् । उपह्वरे । उप । ह्वरे । विदत् ॥१४९१॥

Samveda - Mantra Number : 1491
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 14; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्राय) = इन्द्रियों का मन में निरोध करके जितेन्द्रिय बननेवाले (वज्रिणे) = [वज गतौ] क्रियाशीलतारूप वज्र को हाथ में लिये हुए ‘प्रियमेध' के लिए (गावः) = सब वेदवाणियाँ व इन्द्रियाँ (आशिरम्) = [आशृ] = सब ओर से मलों को भस्म कर देनेवाले (मधु) = सारभूत ज्ञान का, मधुविद्या का, ब्रह्मविद्या का (दुदुहे) = दोहन करती हैं ।

मधुविद्या को प्राप्त करने के लिए आवश्यक है कि हम जितेन्द्रिय बनें । जितेन्द्रिय बनने के लिए आवश्यक है कि क्रियाशीलतारूप वज्र को हम हाथ में लिये हुए हों । ऐसा करने पर ये पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ [गाव:] वेदवाणियों [गाव:] के अध्ययन व अधिगमन से हमें मुधुविद्या को – सारभूत तत्त्वज्ञान को प्राप्त कराएँगी ।

(यत्) = इसका परिणाम यह होगा कि (सीम्) = निश्चय से (उपह्वरे) = अपने हृदय के एकान्त स्थान [A solitary place, Proximity] में, अपने समीप ही यह प्रियमेध (विदत्) = उस प्रभु को पा लेगा [विद्-लाभे] । यहीं प्रियमेध प्रभु का साक्षात्कार कर रहा होगा । ये प्रभु तो हृदयरूप गुफ़ा के अन्दर विचरनेवाले होने से ‘गुहाचरन्' नामवाले हैं। प्रियमेध अपनी सब इन्द्रिय -वृत्तियों को इसी हृदय में केन्द्रित करता है और प्रभु को अपने समीप ही पाता है । 
Subject
समाधि में साक्षात्कार