Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 149

1875 Mantra
Devata- मरुतः Rishi- बिन्दुः पूतदक्षो वा आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
गौ꣡र्ध꣢यति म꣣रु꣡ता꣣ꣳ श्रव꣣स्यु꣢र्मा꣣ता꣢ म꣣घो꣡ना꣢म् । यु꣣क्ता꣢꣫ वह्नी꣣ र꣡था꣢नाम् ॥१४९॥

गौः꣢ । ध꣣यति । मरु꣡ता꣢म् । श्र꣣वस्युः꣢ । मा꣣ता꣢ । म꣣घो꣡ना꣢म् । यु꣣क्ता꣢ । व꣡ह्निः꣢꣯ । र꣡था꣢꣯नाम् ॥१४९॥

Mantra without Swara
गौर्धयति मरुताꣳ श्रवस्युर्माता मघोनाम् । युक्ता वह्नी रथानाम् ॥

गौः । धयति । मरुताम् । श्रवस्युः । माता । मघोनाम् । युक्ता । वह्निः । रथानाम् ॥१४९॥

Samveda - Mantra Number : 149
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(ऋषि) = 'बिन्दु' शब्द सामान्यतः वीर्य के लिए प्रयुक्त होता है। जो व्यक्ति इस बिन्दु का धारण करके अपने को शक्ति का पुञ्ज बनाता है, वह भी 'बिन्दु' कहलाता है। इसने अपने दक्ष=बल को पूत=पवित्र किया है, इसी से यह उस शक्ति को धारण कर पाया है। एवं, यह 'पूतदक्ष' अङ्ग- अङ्ग में रसवाला 'आङ्गिरस' हुआ है । यह ऐसा इसलिए बन पाया है कि इसने शक्ति को अपने अन्दर ही पिया है। वैदिक भाषा में यही इन्द्र का सोमपान है। सामान्य भाषा में इसे शक्ति का शरीर में खपाना कहते हैं। इस शक्ति को शरीर में ही खपाने का उपाय यह है कि मनुष्य अपने को ज्ञान - प्रधान बनाए ।

(सोमपान का उपाय - गौ:) = वेदवाणी ही (धयति) = पीती है। वेदाध्ययन से मनुष्य इस शक्ति को अपने अन्दर ही पी लेता है। यह शक्ति ज्ञानाग्नि का ईंधन बन जाती है और शक्ति का अपव्यय नहीं होता। जो ज्ञान प्राप्ति में लीन हो जाता है। उसकी शक्ति का अपव्यय वासनापूर्ति में नहीं होता।

(यश) = यह वेदवाणी प्रकार हमारे लिए सोमपान करती हुई हमें 'मरुत्'-मित रावी कम बोलनेवाला बनाती है और इन (मरुताम्) = कम बोलनेवालों को यह वेदवाणी (श्रवस्युः) = यश से संयुक्त करनेवाली होती है। शक्तिशाली कर्मवीर बनकर यशस्वी होता है।

(इन्द्रत्व ) = यह वेदवाणी (मघोनाम्) = इन्द्रों की (माता) = निर्माण करनेवाली है। 'सर्वाणि बलकर्माणि इन्द्रस्य' [यास्क] बल के सब कर्म इन्द्र के हैं। वेदवाणी हमें शक्तिशाली कर्मों को करनेवाला बनाती है। इन्द्र ने सब असुरों का संहार कर दिया। वेदाध्ययन का हमारे जीवन पर यही परिणाम होता है कि हमारी आसुर - वृत्तियाँ समाप्त होती हैं। हम इन्द्रियों के दास न रहकर इन्द्रियों के स्वामी इन्द्र बन जाते हैं।

(यात्रा की पूर्ति) = अन्त में यह वेदवाणी (युक्ता) = शरीररूप रथ में जोती जाने पर [ शरीरं रथमेव तु = उप० ] (रथानाम्) = इन रथों की (वह्निः) = यथास्थान [at the destination] पहुँचानेवाली
होती है, अर्थात् हमारी जीवन-यात्रा निर्विघ्न पूर्ण हो जाती है।
Essence
वेदवाणी का अध्ययन शक्ति की रक्षा का मुख्य उपाय है। यह हमें मितभाषी, यशस्वी कर्मोंवाला, आसुर-वृत्तियों का संहार करनेवाला इन्द्र बना देती है और हमें जीवन-यात्रा को पूर्ण करने में समर्थ करती है।
Subject
हैडिंग नहीं है?