Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1481

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- हर्यतः प्रागाथः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ते꣡ जा꣢नत꣣ स्व꣢मो꣣क्यं꣢३꣱सं꣢ व꣣त्सा꣢सो꣣ न꣢ मा꣣तृ꣡भिः꣢ । मि꣣थो꣡ न꣢सन्त जा꣣मि꣡भिः꣢ ॥१४८१॥

ते । जा꣣नत । स्व꣢म् । ओ꣣क्य꣢म् । सम् । व꣣त्सा꣡सः꣢ । न । मा꣣तृ꣡भिः꣢ । मि꣣थः꣢ । न꣣सन्त । जामि꣡भिः꣢ ॥१४८१॥

Mantra without Swara
ते जानत स्वमोक्यं३सं वत्सासो न मातृभिः । मिथो नसन्त जामिभिः ॥

ते । जानत । स्वम् । ओक्यम् । सम् । वत्सासः । न । मातृभिः । मिथः । नसन्त । जामिभिः ॥१४८१॥

Samveda - Mantra Number : 1481
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 13; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(ते) = पिछले मन्त्र वर्णन के अनुसार द्युलोक और पृथिवीलोक की श्री को धारण करनेवाले (स्वम् ओक्यांसम्) = अपने निवास स्थान [घर] परमेश्वर को (न) = इस प्रकार (जानत) = जान पाते हैं जैसे (वत्सास:) = बछड़े (मातृभिः) = अपनी माताओं के साथ होते हैं । बछड़ों का निवास स्थान वह है जहाँ उनकी माता है— इसी प्रकार श्री को धारण करनेवालों का निवास स्थान 'प्रभु' हैं । ये (जामिभिः) = क्रियाशीलता के द्वारा (मिथ:) = आपस में (नसन्त) = मिलते हैं – प्राप्त होते हैं, अर्थात् प्रभु की प्राप्ति का ढंग‘क्रियाशीलता’ है। प्रभु ने स्वयं ही कहा है कि ('कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेत्') = तू कर्मों को करते हुए ही जीने की इच्छा कर । यह कर्म में लगे रहना ही प्रभु-प्राप्ति का - प्रभु से मेल का ढंग है। कोई भी अकर्मण्य व्यक्ति प्रभु को नहीं पा सकता ।

बछड़े माताओं के द्वारा जिस प्रकार प्रेम से रास्ता दिखलाये जाते हुए अपने घरों को प्राप्त होते हैं—इसी प्रकार प्रभुभक्त, प्रभु से प्रेमपूर्वक पथ-प्रदर्शन द्वारा निजगृह में पहुँचाये जाते हैं । इनका निज घर 'प्रभु' ही है, अतः क्रियाशीलता के द्वारा ये प्रभु से सङ्गत होते हैं। ये प्रभु को प्राप्त करते हैं — प्रभु इन्हें प्राप्त होते हैं ।

लोक-व्यवहार के अर्थ में जैसे लोग (मिथ:) = आपस में (जामिभि:) = बहिनों से (संनसन्त) = परस्पर सम्बन्धवाले हो जाते हैं, उसी प्रकार जीव क्रियाशीलता से प्रभु का सम्बन्धी बनता है। प्रभु तो स्वाभाविक क्रियावाले हैं – जीव भी क्रियाशीलता को अपनाकर प्रभु-भक्त बन जाता है - प्रभु का उप-आसक हो जाता है ।
Essence
क्रियाशीलता के द्वारा हम अपने घर में पहुँचनेवाले बनें।
Subject
अपने घर को प्राप्त करना