Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1478

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- विश्वामित्रो गाथिनः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
वा꣣जी꣡ वाजे꣢꣯षु धीयतेऽध्व꣣रे꣢षु꣣ प्र꣡ णी꣢यते । वि꣡प्रो꣢ य꣣ज्ञ꣢स्य꣣ सा꣡ध꣢नः ॥१४७८॥

वा꣣जी꣢ । वा꣡जे꣢꣯षु । धी꣣यते । अध्वरे꣡षु꣢ । प्र । नी꣣यते । वि꣡प्रः꣢꣯ । वि । प्रः꣣ । यज्ञ꣡स्य꣢ । सा꣡ध꣢꣯नः ॥१४७८॥

Mantra without Swara
वाजी वाजेषु धीयतेऽध्वरेषु प्र णीयते । विप्रो यज्ञस्य साधनः ॥

वाजी । वाजेषु । धीयते । अध्वरेषु । प्र । नीयते । विप्रः । वि । प्रः । यज्ञस्य । साधनः ॥१४७८॥

Samveda - Mantra Number : 1478
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 13; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
जो व्यक्ति सचमुच 'उशना : ' = प्रभु के गुणों की प्राप्ति की प्रबल कामनावाला होता है तथा ‘काव्यः'=अर्थतत्त्व [वास्तविकता] को जानकर चलता है, वह १. (वाजी) = शक्तिशाली बनता हैऔर (वाजेषु) = शक्तिशाली कामों में (धीयते) = सदा रक्खा जाता है । यह संसार में सदा क्रियाशील जीवनवाला होता है । यह क्रियाशीलता ही इसके वासनाओं से बचे रहकर शक्तिशाली बनने का रहस्य बनती है। २. (अध्वरेषु) = हिंसारहित यज्ञों में यह (प्रणीयते) = आगे और आगे ले जाया जाता है। हिंसारहित कर्मों को करता हुआ यह जीवन में उन्नति-पथ पर आगे बढ़ता है । ३. (विप्रः) = यह विशेषरूप से अपना पूरण करनेवाला होता है और ४. (यज्ञस्य साधन:) = लोकहित के श्रेष्ठतम कर्मों को सिद्ध करनेवाला होता है । 
Essence
हम शक्तिशाली कर्मों में लगे रहें, अहिंसा के मार्ग पर आगे बढ़ें, अपनी न्यूनताओं को दूर कर अपना पूरण करनेवाले हों-लोकहित के कार्यों में प्रवृत्त हों। 
Subject
वाज, अध्वर, यज्ञ
Footnote
नोट–‘वाज, अध्वर और यज्ञ' तीनों ही शब्द यज्ञ के लिए प्रयुक्त होते हैं । यहाँ उनमें इस प्रकार भेद करके दिखाया गया है १. वाज शक्तिशाली कर्म हैं, २. अध्वर — अहिंसा का मार्ग है और ३. यज्ञ लोकहित के लिए किये गये श्रेष्ठतम कर्म हैं ।