Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1477

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- विश्वामित्रो गाथिनः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
हो꣡ता꣢ दे꣣वो꣡ अम꣢꣯र्त्यः पु꣣र꣡स्ता꣢देति मा꣣य꣡या꣢ । वि꣣द꣡था꣢नि प्रचो꣣द꣡य꣢न् ॥१४७७॥

हो꣡ता꣢꣯ । दे꣣वः꣢ । अ꣡म꣢꣯र्त्यः । अ । म꣣र्त्यः । पु꣡रस्ता꣢त् । ए꣣ति । माय꣡या꣢ । वि꣣द꣡था꣢नि । प्र꣣चोद꣡य꣢न् । प्र꣣ । चोद꣡य꣢न् ॥१४७७॥

Mantra without Swara
होता देवो अमर्त्यः पुरस्तादेति मायया । विदथानि प्रचोदयन् ॥

होता । देवः । अमर्त्यः । अ । मर्त्यः । पुरस्तात् । एति । मायया । विदथानि । प्रचोदयन् । प्र । चोदयन् ॥१४७७॥

Samveda - Mantra Number : 1477
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 13; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
वे प्रभु (होता) = सब-कुछ देनेवाले हैं [हु: दान], (देवः) = वे प्रभु दिव्य गुणोंवाले हैं, (अमर्त्यः) = अमरणधर्मा हैं । वस्तुतः जीव को भी इन गुणों को ही अपने अन्दर धारण करना हैकभी लोभ में न फँसकर सदा देनेवाला बनना है, उसने क्रोध से ऊपर उठकर देव बनना है और काम से ऊपर उठकर, किसी भी वस्तु के लिए अत्यन्त लालायित न होते हुए [=न मरते हुए] अमर बनना है ।

यह प्रभु (मायया) = अपनी दया [Pity] की वृत्ति के कारण असाधारण शक्ति [Extra ordinary power] व प्रज्ञा [Wisdom] के साथ (पुरस्तात् एति) = हमारे सामने आते हैं। मानो हमें भी ‘दयालुता, शक्ति व ज्ञान' प्रदान करना चाहते हैं। हमारा कितना दौर्भाग्य है कि प्रभु तो इन देय वस्तुओं के साथ उपस्थित होते हैं और हम लेने के लिए उद्यत नहीं होते- हमने अपने को पात्र नहीं बनाया होता ।

वे प्रभु निरन्तर (विदथानि) = ज्ञान, त्याग [Knowledge, sacrifice] तथा वासनाओं के साथ संग्राम [battle] की (प्रचोदयन्) = प्रेरणा दे रहे हैं। ‘विदथ' शब्द के तीनों ही अर्थ यहाँ अभिप्रेत हैं। प्रभु स्पष्ट कह रहे हैं कि यदि वासनाओं के साथ संग्राम में जीतना है तो ज्ञान प्राप्त करो, मस्तिष्क को ज्ञानाग्नि से दीप्त करो तथा त्याग की वृत्ति को अपनाओ - अपने हृदयों में त्याग की भावना भरो।

प्रस्तुत मन्त्र में माया शब्द के भी तीन अर्थ हैं तथा विदथ के भी तीन अर्थ हैं। माया शब्द की भावना यह है कि हृदय में दया हो– बाहुओं में शक्ति हो तथा मस्तिष्क ज्ञानाग्नि से दीप्त हो । विदथ शब्द भी मस्तिष्क को ज्ञान से परिपूर्ण करके और हृदय को त्याग की भावना से भरकर बाहुओं से शत्रुओं के साथ संग्राम करने का संकेत कर रहा है। इन भावनाओं को भरने की कामनावाला ‘उशना: ' प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि है । यह 'काव्यः'=अर्थतत्त्व को देखता है - और पदार्थों के पीछे मरनेवाला नहीं बनता । 
Essence
प्रभु तो कृपा करके शक्ति व ज्ञान देते ही हैं— मैं लेने के लिए तैयार बनूँ । 
Subject
वह तो देता है- -हम लेनेवाले बनें [माया-विदथ ]