Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1474

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- वर्धमाना गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त्व꣡म꣢ग्ने य꣣ज्ञा꣢ना꣣ꣳ हो꣢ता꣣ वि꣡श्वे꣣षाꣳ हि꣣तः꣢ । दे꣣वे꣢भि꣣र्मा꣡नु꣢षे꣣ ज꣡ने꣢ ॥१४७४॥

त्व꣢म् । अ꣣ग्ने । यज्ञा꣡ना꣢म् । हो꣡ता꣢꣯ । वि꣡श्वे꣢꣯षाम् । हि꣡तः꣢ । दे꣣वे꣡भिः꣢ । मा꣡नु꣢꣯षे । ज꣡ने꣢꣯ ॥१४७४॥

Mantra without Swara
त्वमग्ने यज्ञानाꣳ होता विश्वेषाꣳ हितः । देवेभिर्मानुषे जने ॥

त्वम् । अग्ने । यज्ञानाम् । होता । विश्वेषाम् । हितः । देवेभिः । मानुषे । जने ॥१४७४॥

Samveda - Mantra Number : 1474
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 13; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
संख्या २ पर इस मन्त्र का अर्थ इस प्रकार है -

हे (अग्ने) = मोक्ष-स्थान को प्राप्त करानेवाले प्रभो ! (त्वम्) = आप (विश्वेषाम्) = सब (यज्ञानाम्) = श्रेष्ठतम कर्मों के (होता) = सम्पादयिता हैं । आप (देवेभिः) = दिव्य गुणों के द्वारा (मानुषे जने) = मानवता–दयालुता से युक्तजन में (हित:) = प्रतिष्ठित होते हैं।
Essence
सब उत्तम कर्म उस प्रभुकृपा से होते हैं । दिव्य गुणों से प्रभु की प्राप्ति होती है । 
Subject
दिव्य गुणों से दिव्य प्रभु का दर्शन