Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1473

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- उशनाः काव्यः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
शु꣣ष्मी꣢꣫ शर्धो꣣ न꣡ मारु꣢꣯तं पव꣣स्वा꣡न꣢भिशस्ता दि꣣व्या꣢꣫ यथा꣣ वि꣢ट् । आ꣢पो꣣ न꣢ म꣣क्षू꣡ सु꣢म꣣ति꣡र्भ꣢वा नः स꣣ह꣡स्रा꣢प्साः पृतना꣣षा꣢꣫ण् न य꣣ज्ञः꣢ ॥१४७३॥

शुष्मी꣢ । श꣡र्धः꣢꣯ । न । मा꣡रु꣢꣯तम् । प꣣वस्व । अ꣡न꣢꣯भिशस्ता । अन् । अ꣣भिशस्ता । दिव्या꣢ । य꣡था꣢꣯ । विट् । आ꣡पः꣢꣯ । न । म꣣क्षु꣢ । सु꣣मतिः꣢ । सु꣣ । मतिः꣢ । भ꣣व । नः । सहस्रा꣡प्साः꣢ । स꣣ह꣡स्र꣢ । अ꣣प्साः । पृतनाषा꣢ट् । न । य꣣ज्ञः꣢ ॥१४७३॥

Mantra without Swara
शुष्मी शर्धो न मारुतं पवस्वानभिशस्ता दिव्या यथा विट् । आपो न मक्षू सुमतिर्भवा नः सहस्राप्साः पृतनाषाण् न यज्ञः ॥

शुष्मी । शर्धः । न । मारुतम् । पवस्व । अनभिशस्ता । अन् । अभिशस्ता । दिव्या । यथा । विट् । आपः । न । मक्षु । सुमतिः । सु । मतिः । भव । नः । सहस्राप्साः । सहस्र । अप्साः । पृतनाषाट् । न । यज्ञः ॥१४७३॥

Samveda - Mantra Number : 1473
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 13; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(शुष्पी) = यह सोम शत्रुओं का शोषण करनेवाला है, इसके शरीर में सुरक्षित होने पर रोग-कृमि नष्ट हो जाते हैं और शरीर बड़ा स्वस्थ होता है । (शर्ध: न मारुतम्) = यह सोम वायु की शक्ति [शर्ध:] के समान है—जैसे प्रचण्ड वायु का वेग सब वस्तुओं को उड़ा ले जाता है, उसी प्रकार यह सोम सब रोगों को भगा देता है । इस सोम से मनुष्य को वायु के समान बल प्राप्त होता है । (पवस्व) = हे

सोम! तू हममें पवित्रता उत्पन्न कर । तू इस प्रकार सबके जीवनों को पवित्र बना (यथा) = जिससे कि (विट्) = सारी प्रजा (अनभिशस्ता) = अनिन्दनीय हो तथा (दिव्या) = दिव्य गुणसम्पन्न बने।

हे सोम ! तू (मक्षु) = शीघ्र ही (आपः न) = जलों की भाँति (पवस्व) = हमारे जीवनों को पवित्र करनेवाला हो और (न:) = हमारे लिए (सुमतिः) = उत्तम बुद्धिवाला (भव) = हो । हमारी बुद्धियाँ सोम की रक्षा से दीप्त व तीव्र हो जाती हैं । हे सोम ! तू हमारे लिये (स-हस्र-अप्साः) = परसन्नरूपवाला हो । सोम के होने पर जीवन में उल्लास चेहरे पर प्रसाद के रूप में प्रकट होता है और सोमपान करनेवाले का चेहरा सदा प्रसन्न दिखता है। (पृतनाषाट् न) = यह सोम काम-क्रोध, लोभ-मोह, मद-मत्सर की सेना का पराभव करनेवाले के समान होता है । यह वह सेनापति है, जो हमारे इन सब अध्यात्मशत्रुओं को समाप्त कर देता है ।

इन सब दृष्टिकोणों से यह सोम (यज्ञः) = सङ्गतीकरणयोग्य होता है [यज-सङ्गतीकरण] । सोम शरीर का ही भाग बनाने के योग्य है—इसे शरीर में ही खपाने के लिए हमें प्रयत्नशील होना चाहिए।
Essence
सोम हमें शक्तिशाली, पवित्र, अनिन्दनीय, दिव्य जीवनवाला बनाता है, हमारी बुद्धियों को उत्तम बनाता है- हमारा जीवन प्रसादमय होता है और हमारे अध्यात्म- शत्रुओं को यह कुचल डालता है। सोम ‘यज्ञ' है – शरीर का ही भाग बनाने के योग्य है।
Subject
शक्ति- -प्रशस्त जीवन : सुमति- -सम्प्रसाद