Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1470

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
के꣣तुं꣢ कृ꣣ण्व꣡न्न꣢के꣣त꣢वे꣣ पे꣡शो꣢ मर्या अपे꣣श꣡से꣢ । स꣢मु꣣ष꣡द्भि꣢रजायथाः ॥१४७०॥

के꣣तु꣢म् । कृ꣣ण्व꣢न् । अ꣣केत꣡वे꣢ । अ꣣ । केत꣡वे꣢ । पे꣡शः꣢꣯ । म꣣र्याः । अपेश꣡से꣢ । अ꣣ । पेश꣡से꣣ । सम् । उ꣣ष꣡द्भिः꣢ । अ꣣जायथाः ॥१४७०॥

Mantra without Swara
केतुं कृण्वन्नकेतवे पेशो मर्या अपेशसे । समुषद्भिरजायथाः ॥

केतुम् । कृण्वन् । अकेतवे । अ । केतवे । पेशः । मर्याः । अपेशसे । अ । पेशसे । सम् । उषद्भिः । अजायथाः ॥१४७०॥

Samveda - Mantra Number : 1470
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 13; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे प्रभो ! जो भी व्यक्ति भटकनेवाले मन को आपमें जोड़ता है तथा विषयों में विचरण करनेवाली इन्द्रियों को रथ में जोतकर आगे बढ़ता है उसके लिए आप (अकेतवे) = प्रकाश से रहित के लिए भी (केतुं कृण्वन्) = प्रकाश करते हो तथा (अपेशसे मर्या) = [मर्याय] उत्तम यज्ञिय वृत्ति आदि गुणों से अनलंकृत के लिए भी (पेशः) = रूप को – परिष्कृति को करते हो । उसके जीवन को सद्गुणों से अलंकृत कर देते हो ।

इस प्रकार (सम्) = सम्यक्तया (उषद्भिः) = अज्ञानान्धकारों के दहन के साथ [उष् दाहे] (अजायथाः) = आप प्रादुर्भूत होते हो । प्रभु प्रतिदिन ध्यान लगानेवाले व्यक्ति को १. ज्ञान से दीप्त करते हैं, २. सद्गुणों से अलंकृत करते हैं और ३. अज्ञानान्धकारों व मालिन्य का दहन करके उसके हृदयान्तरिक्ष में प्रादुर्भूत होते हैं ।
Essence
ज्ञान और सद्गुणालंकृति से हमारे हृदयों में प्रभु का प्रकाश हो ।
Subject
ज्ञान – गुणालंकृति-प्रभुदर्शन