Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1463

1875 Mantra
Devata- ब्रह्मणस्पतिः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
सो꣣मा꣢ना꣣ꣳ स्व꣡र꣢णं कृणु꣣हि꣡ ब्र꣢ह्मणस्पते । क꣣क्षी꣡व꣢न्तं꣣ य꣡ औ꣢शि꣣जः꣢ ॥१४६३॥

सो꣣मा꣡ना꣢म् । स्व꣡र꣢꣯णम् । कृ꣣णुहि꣢ । ब्र꣣ह्मणः । पते । कक्षी꣡व꣢न्तम् । यः । औ꣣शिजः꣢ ॥१४६३॥

Mantra without Swara
सोमानाꣳ स्वरणं कृणुहि ब्रह्मणस्पते । कक्षीवन्तं य औशिजः ॥

सोमानाम् । स्वरणम् । कृणुहि । ब्रह्मणः । पते । कक्षीवन्तम् । यः । औशिजः ॥१४६३॥

Samveda - Mantra Number : 1463
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 13; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रस्तुत मन्त्र १३९ संख्या पर इस प्रकार व्याख्यात है -

(ब्रह्मणस्पते) हे ज्ञान के पति प्रभो ! आप मुझे (सोमानाम्) = सौम्य तथा निर्माण के ही कार्यों में रुचिवाला, (स्वरणम्) = [स्वर् to radiate] ज्ञान के प्रकाश को चारों ओर फैलानेवाला, (कक्षीवन्तम्) = सदा कमर कसे हुए उत्तम कार्यों के लिए तैयार पर तैयार तथा (य: औशिज:) = जो सबका भला चाहनेवाला मेधावी है, ऐसा (कृणुहि) = बनाइए ।
Essence
ज्ञान प्राप्त करके मैं सौम्य, ज्ञान के प्रकाश को फैलानेवाला, सतत क्रियाशील तथा सबका भला चाहनेवाला मेधावी बनूँ । इस प्रकार प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि मेधातिथि काण्व बनूँ । नोट–‘सोमानाम्’ में विभक्तिव्यत्यय है। ।
Subject
ज्ञान के चार प्रभाव