Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1451

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- सुकक्ष आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
न꣢व꣣ यो꣡ न꣢व꣣तिं꣡ पुरो꣢꣯ बि꣣भे꣡द꣢ बा꣣꣬ह्वो꣢꣯जसा । अ꣡हिं꣢ च वृत्र꣣हा꣡व꣢धीत् ॥१४५१॥

न꣡व꣢꣯ । यः । न꣣व꣢तिम् । पु꣡रः꣢꣯ । बि꣣भे꣡द꣢ । बा꣣ह्वो꣢जसा । बा꣣हु꣢ । ओ꣣जसा । अ꣡हि꣢꣯म् । च । वृत्रहा꣢ । वृ꣣त्र । हा꣢ । अ꣣वधीत् ॥१४५१॥

Mantra without Swara
नव यो नवतिं पुरो बिभेद बाह्वोजसा । अहिं च वृत्रहावधीत् ॥

नव । यः । नवतिम् । पुरः । बिभेद । बाह्वोजसा । बाहु । ओजसा । अहिम् । च । वृत्रहा । वृत्र । हा । अवधीत् ॥१४५१॥

Samveda - Mantra Number : 1451
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 13; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
गत मन्त्र में कहा था कि प्रभुरूप सूर्य 'अस्ता' के हृदयाकाश में उदित होते हैं, अतः प्रस्तुत मन्त्र में उसी अस्ता का लक्षण विस्तार से किया है - (यः) = जो (नवनवतिम्) = निन्यानवे (पुरः) = असुरों की पुरियों को (बाहु ओजसा) = [बाह्र प्रयत्ने] -सदा कर्मों में प्रयत्नशीलता से जनित ओज के द्वारा (बिभेद) = विदीर्ण कर देता है । असुर हमारे शरीरों में सदा अपना अधिष्ठान बनाकर अपना दुर्ग बनाते रहते हैं । निन्यानवे के निन्यानवे वर्ष इन असुरों के किले ही बनते चलते हैं, परन्तु जो व्यक्ति 'कर्मणे हस्तौ विसृष्टौ'–‘प्रभु ने कर्म के लिए हाथ दिये हैं', इस तत्त्व को समझकर सतत कर्मों में प्रयत्नशील रहता है। यह व्यक्ति अपने प्रयत्नजनित ओजों से असुरों की इन नगरियों को नष्ट-भ्रष्ट कर देता है ।

यह ‘बाह्वोजस्’ वाला व्यक्ति ज्ञान पर आवरण को ले-आनेवाले वृत्र को नष्ट कर देता है और 'वृत्र-हा' नामवाला होता है। कामवासना ही वृत्र है । काम और ज्ञान का सनातन विरोध है । (च) = और यह वृत्रहा (अहिम्) = [आहन्ति इति] हनन की वृत्ति को (अवधीत्) = नष्ट कर डालता है।

कामवासना व औरों के हनन की वृत्ति का हनन करनेवाला यह पुरुष 'सुकक्ष' उत्तम शरणवाला होता है। वासनाओं का विदारण करनेवाला यह 'आङ्गिरस' तो है ही ।
Essence
हम वासना का विदारण करें, हनन की वृत्ति का हनन करनेवाले हों ।
Subject
‘अस्तारम्' का स्पष्टीकरण