Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1450

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- सुकक्ष आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उ꣢꣯द्घेद꣣भि꣢ श्रु꣣ता꣡म꣢घं वृष꣣भं꣡ नर्या꣢꣯पसम् । अ꣡स्ता꣢रमेषि सूर्य ॥१४५०॥

उ꣢त् । घ꣣ । इ꣢त् । अ꣣भि꣢ । श्रु꣣ता꣡म꣢घम् । श्रु꣣त꣢ । म꣣घम् । वृषभ꣢म् । न꣡र्या꣢꣯पसम् । न꣡र्य꣢꣯ । अ꣣पसम् । अ꣡स्ता꣢꣯रम् । ए꣣षि । सूर्य ॥१४५०॥

Mantra without Swara
उद्घेदभि श्रुतामघं वृषभं नर्यापसम् । अस्तारमेषि सूर्य ॥

उत् । घ । इत् । अभि । श्रुतामघम् । श्रुत । मघम् । वृषभम् । नर्यापसम् । नर्य । अपसम् । अस्तारम् । एषि । सूर्य ॥१४५०॥

Samveda - Mantra Number : 1450
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 13; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
इस मन्त्र का अर्थ १२५ संख्या पर इस प्रकार है- हे (सूर्य) = सारे संसार के सञ्चालक प्रभो ! (घ इत्) = निश्चय से आप अभि उदेषि-उस मनुष्य के हृदयाकाश में उदित होते हैं जो १. (श्रुतामघम्) = ज्ञानरूप ऐश्वर्य का स्वामी है, २. (वृषभम्) = शक्तिशाली है, ३. (नर्यापसम्) = मानवहित के कर्मों का करनेवाला है, ४.(अस्तारम्) = विषय-वासनाओं को अपने से दूर फेंकनेवाला है।
Essence
हम ज्ञानैश्वर्यवाले, शक्तिशाली, मानवहित के कर्म करनेवाले, और वासनाओं को परे फेंकनेवाले बनें, जिससे हमारे हृदयाकाश में प्रभुरूप सूर्य का उदय हो । 
Subject
सूर्योदय, कहाँ ?