Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 145

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- श्रुतकक्षः आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
अ꣡पा꣢दु शि꣣प्र्य꣡न्ध꣢सः सु꣣द꣡क्ष꣢स्य प्रहो꣣षि꣡णः꣢ । इ꣢न्द्रो꣣रि꣢न्द्रो꣣ य꣡वा꣢शिरः ॥१४५॥

अ꣡पा꣢꣯त् । उ꣣ । शिप्री꣢ । अ꣡न्ध꣢꣯सः । सु꣣द꣡क्ष꣢स्य । सु꣣ । द꣡क्ष꣢꣯स्य । प्र꣣होषि꣡णः꣢ । प्र꣣ । होषि꣡णः꣢ । इ꣢न्दोः꣢꣯ । इन्द्रः꣢꣯ । य꣡वा꣢꣯शिरः । य꣡व꣢꣯ । आ꣣शिरः ॥१४५॥

Mantra without Swara
अपादु शिप्र्यन्धसः सुदक्षस्य प्रहोषिणः । इन्द्रोरिन्द्रो यवाशिरः ॥

अपात् । उ । शिप्री । अन्धसः । सुदक्षस्य । सु । दक्षस्य । प्रहोषिणः । प्र । होषिणः । इन्दोः । इन्द्रः । यवाशिरः । यव । आशिरः ॥१४५॥

Samveda - Mantra Number : 145
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(शिप्री)=ज्ञान के शिरस्त्राणवाले (इन्द्रः)=परमैश्वर्यशाली प्रभु (अन्धसः)=अन्धकार का [अन्ध+ अस्] (अपात् उ)=निश्चय से पान कर जाते हैं - नाश कर देते हैं। शिप्र शब्द Helmet = शिरस्त्राण का वाचक है, अतः शिप्री का अर्थ हुआ शिरस्त्राणवाले । वे इन्द्र = ज्ञानरूप परमैश्वर्यवाले हैं। वे प्रभु हमें उत्कृष्ट ज्ञान देते हुए हमारे अज्ञानान्धकार को नष्ट कर देते हैं।

१. (सु- दक्षस्य) = उत्तम मार्ग से आगे बढ़नेवाले के [दक्ष - to go, to move]। जिस व्यक्ति के जीवन का लक्ष्य उत्तम मार्ग से आगे बढ़ना है, उसका अज्ञानान्धकार नष्ट हो जाता है। ध्येय व क्रिया की उत्तमता उसे पवित्र बनाती है और पवित्र हृदय में ही ज्ञान का प्रकाश होता है।

२. (प्र-होषिणः)=प्रकृष्ट त्याग करनेवाले के [हु-त्याग] । वस्तुतः त्यागयुक्त क्रियाएँ ही मनुष्य को निर्मल बनाती हैं । ('यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्') = दान मनुष्य को पवित्र करनेवाला है। यही पवित्रता हमें ज्ञान प्राप्ति के योग्य बनाती है ।

३. (इन्दोः) = इन्दु के। इन्दु शब्द सोम का वाचक है-semen, vitality=वीर्यशक्ति। जो व्यक्ति अपने को वीर्यशक्ति का पुञ्ज बनाता है, वह इन्दु है। प्रभु इसके अज्ञानान्धकार को नष्ट करते हैं।

४. (यवाशिरः)=यवाशिर के। गो शब्द ज्ञानेन्द्रियों का वाचक है [गमयन्ति अर्थान्] और यव शब्द कर्मेन्द्रियों का [यूयन्ते कर्मसु ] । 'आशृ' से बनकर आशिर् शब्द 'चारों ओर से हिंसा करनेवाले' को कह रहा है। यह कुमार्ग पर जानेवाली इन्द्रियों को काबू करता है। वस्तुतः उपस्थादि इन्द्रियों के संयम से ही तो यह 'इन्दु' शक्ति का पुञ्ज बन पाया था। वह नष्ट अज्ञानान्धकारवाला व्यक्ति 'श्रुतकक्ष' - ज्ञानरूप शरणवाला है, अतएव विषयों में आसक्त न होने के कारण 'आङ्गिरस' = शक्तिसम्पन्न है। 
Essence
हम उत्तम मार्ग से चलनेवाले, त्यागशील, शक्तिपुञ्ज और कर्मेन्द्रियों के वशकर्ता बनें, जिससे हमारा अज्ञानान्धकार पूर्णरूप से नष्ट हो जाए।
Subject
अज्ञानान्धकार का नाश