Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1449

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प꣡व꣢मान सु꣣वी꣡र्य꣢ꣳ र꣣यि꣡ꣳ सो꣢म रिरीहि णः । इ꣢न्द꣣वि꣡न्द्रे꣢ण नो यु꣣जा꣢ ॥१४४९॥

प꣡व꣢꣯मान । सु꣣वी꣡र्य꣢म् । सु꣣ । वी꣡र्य꣢꣯म् । र꣣यि꣢म् । सो꣣म । रिरीहि । नः । इ꣡न्दो꣢꣯ । इ꣡न्द्रे꣢꣯ण । नः꣣ । युजा꣢ ॥१४४९॥

Mantra without Swara
पवमान सुवीर्यꣳ रयिꣳ सोम रिरीहि णः । इन्दविन्द्रेण नो युजा ॥

पवमान । सुवीर्यम् । सु । वीर्यम् । रयिम् । सोम । रिरीहि । नः । इन्दो । इन्द्रेण । नः । युजा ॥१४४९॥

Samveda - Mantra Number : 1449
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 13; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे पवमान (सोम) = हमारे जीवनों को पवित्र करनेवाले सोम! तू (न:) = हमें (सुवीर्यम्) = उत्तम प्राणशक्ति को तथा (रयिम्) = रयिशक्ति को [प्राणशक्ति ही पुरुष में सुवीर्य व स्त्री में रयि कहलाती है] (रिरीहि) = दे । हमारे शरीरों को वीर्य व रयि से युक्त कर । जिस समय इन रयि व सुवीर्यरूप चन्द्रशक्ति व सूर्यशक्तियों से हमारे शरीर संयुक्त होते हैं तब ये नीरोग, आह्लादमय व प्रकाशयुक्त होते हैं । शरीर नीरोग है तो मन प्रसन्न और बुद्धि उज्ज्वल ।

इस प्रकार हमारे जीवनों को सुन्दर बनाकर सोम हमें उन्नति-पथ पर आगे बढ़ने के योग्य बनाता है। आगे बढ़ते हुए हम एक दिन प्रभु के समीप पहुँचनेवाले हो जाते हैं । मन्त्र का ऋषि ‘असित' सोम से कहता है कि हे (इन्दो) = शक्ति देनेवाले सोम ! तू (इन्द्रेण) = उस परमात्मा से (नः) = हमें (युज) = सङ्गत कर दे । वस्तुत: यह ‘सोम’-वीर्यशक्ति जड़ जगत् की सर्वोत्तम वस्तु है, वह सोम=परमात्मा चेतन जगत् में सर्वश्रेष्ठ है । यह सोम ही उस सोम को प्राप्त कराने में समर्थ है।
Essence
हे पवित्र करनेवाले सोम! तू हमें सुवीर्य व रयि प्राप्त कराके प्रभु से मेल के योग्य बना दे।
Subject
सोम से सोम का मिलन