Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 144

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- इरिम्बिठिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
प्र꣢ स꣣म्रा꣡जं꣢ चर्षणी꣣ना꣡मिन्द्र꣢꣯ꣳ स्तोता꣣ न꣡व्यं꣢ गी꣣र्भिः꣢ । न꣡रं꣢ नृ꣣षा꣢हं꣣ म꣡ꣳहि꣢ष्ठम् ॥१४४॥

प्र꣢ । स꣣म्रा꣡ज꣢म् । स꣣म् । रा꣡ज꣢꣯म् । च꣣र्षणी꣣ना꣢म् । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । स्तो꣣त । न꣡व्य꣢꣯म् । गी꣣र्भिः꣢ । न꣡र꣢꣯म् । नृ꣣षा꣡ह꣢म् । नृ꣣ । सा꣡ह꣢꣯म् । मँ꣡हि꣢꣯ष्ठम् ॥१४४॥

Mantra without Swara
प्र सम्राजं चर्षणीनामिन्द्रꣳ स्तोता नव्यं गीर्भिः । नरं नृषाहं मꣳहिष्ठम् ॥

प्र । सम्राजम् । सम् । राजम् । चर्षणीनाम् । इन्द्रम् । स्तोत । नव्यम् । गीर्भिः । नरम् । नृषाहम् । नृ । साहम् । मँहिष्ठम् ॥१४४॥

Samveda - Mantra Number : 144
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(प्रस्तोत)= खूब स्तुति करो। किसकी? १. (चर्षणीनां सम्राजम्) = [चर्षणय:=कर्षण:] कृषि-तुल्य उद्योग करनेवाले पुरुषों को दीप्त करनेवाले की, २.( इन्द्रम्) = परमैश्वर्यवाले की, ३. (गीर्भिः नव्यम्) = सब वेदवाणियों से स्तुति किये जानेवाले प्रभु की, ४. (नरम्) = आगे ले-चलनेवाले प्रभु की, ५. (नृ-षाहम्)=[षह्-मर्षणे to show mercy], उन्नतिशील पुरुषों पर कृपा-दृष्टि रखनेवाले की, ६. मंहिष्ठम् सर्वाधिक दानशील की ।

१. प्रभु अपनी वेदवाणी में जीव को उपदेश देते हैं कि ('अक्षैर्मा दीव्यः कृषिमित् कृषस्व')=जुआ न खेलकर, खेती कर । वस्तुतः श्रम में ही दीप्ति है। श्रमशील व्यक्ति ही प्रभु के प्रिय होते हैं। आलस्य हमें शैतान की प्रजा बनाता है।

२. श्रमशीलता होने पर हम उस ज्ञानरूप परमैश्वर्य को भी पाते हैं जो हमें प्राकृतिक भोग-पंक में फँसने से बचाकर प्रभु का सच्चा उपासक बनाता है।

३. इस ज्ञान का यह परिणाम होता है कि हम वेदवाणियों से उस प्रभु की महिमा का गायन करते हैं। (‘सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति) = सारे वेद उस प्रभु की ही महिमा का गायन कर रहे हैं।

४. यह प्रभु-गुण-गायन (नरम्) = हमें आगे ले - चलता है - हमारे उत्थान का कारण बनता हैं, प्रभु के गुणों में रुचि उत्पन्न होकर हम दैवी सम्पत्ति को अपने अन्दर बढ़ानेवाले बनते हैं।

५. यह दैवी सम्पत्ति प्रथम तो इस रूप में प्रकट होती है कि हम अन्य मनुष्यों पर दया - दृष्टिवाले बनते हैं, मनुष्य की अल्पज्ञता व स्खलनशीलता का ध्यान रखते हुए तैश में नहीं आते।

६. इसी दैवी सम्पत्ति का दूसरा परिणाम यह है कि हम (मंहिष्ठ) = बनते हैं। ('देवो दानात्') = देव होते ही देनेवाले हैं। यह स्तोता उस महान् दाता प्रभु का स्मरण करके देनेवाला बनता है और देव हो जाता है।

यह स्तोता ‘इरिम्बिठि' था। इसका विठं हृदयान्तरिक्ष सदा इरि= गतिशील था। उसमें निरन्तर प्रभुस्मरण की धारा बह रही थी। इसी सतत प्रभुस्मरण ने उसे शनैः-शनैः करके जीवन-मार्ग में उन्नत किया था, अतः कण-कण करके दिव्य गुणों का भण्डार बनने के कारण यह ‘इरिम्बिठि काण्व' कहलाया। 
Essence
प्रभु-स्तवन से हम अपने जीवन-पथ को प्रशस्त बनाते हुए 'देव' बनें।
Subject
प्रभु-स्तवन