Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1438

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- कविर्भार्गवः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स꣡ न꣢ ऊ꣣र्जे꣢ व्य꣣꣬३꣱व्य꣡यं꣢ प꣣वि꣡त्रं꣢ धाव꣣ धा꣡र꣢या । दे꣣वा꣡सः꣢ शृ꣣ण꣢व꣣न्हि꣡ क꣢म् ॥१४३८॥

सः꣢ । नः꣣ । ऊर्जे꣢ । वि । अ꣣व्य꣡य꣢म् । प꣣वि꣡त्र꣢म् । धा꣣व । धा꣡र꣢꣯या । दे꣣वा꣡सः꣢ । शृ꣣ण꣡व꣢न् । हि । क꣣म् ॥१४३८॥

Mantra without Swara
स न ऊर्जे व्य३व्ययं पवित्रं धाव धारया । देवासः शृणवन्हि कम् ॥

सः । नः । ऊर्जे । वि । अव्ययम् । पवित्रम् । धाव । धारया । देवासः । शृणवन् । हि । कम् ॥१४३८॥

Samveda - Mantra Number : 1438
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 13; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
चन्द्र ओषधीश है— इस सोम नामवाले चन्द्र से ओषधियों में रस का सञ्चार होता है। ओषधियों का राजा भी ‘सोम' कहलाता है । यह जब यज्ञ में आहुत होता है तब वृष्टि होकर सात्त्विक सौम्य अन्न उत्पन्न होता है। इस सौम्य अन्न से शरीर में 'सोम' की उत्पत्ति होती है । एवं, आधिदैविक सोम [चन्द्र] से पार्थिव सोम [लता] की उत्पत्ति होती है, उससे अध्यात्म सोम [semen] बनता है। इस सोम की ऊर्ध्वगति होने पर सोम [परमात्मा] के दर्शन होते हैं । एवं, इन सोमों में कार्यकारणभाव चलता है।

शरीर में उत्पन्न सोम से 'कविर्भार्गव' कहता है कि (सः) = वह तू (न:) = हमारी (ऊर्जे) = बल और प्राणशक्ति के लिए अपनी (धारया) = धारक शक्ति के साथ (पवित्रम्) = पवित्र तथा (अव्ययम्) = [अ-वि अय] विविध विषय-वासनाओं की ओर न जानेवाले हृदय की ओर (विधाव) = विशेषरूप से गतिवाला हो । वीर्य की ऊर्ध्वगति का ही परिणाम है कि १. शरीर बल व प्राणशक्ति-सम्पन्न बनता है, २. हृदय पवित्र होता है और ३. यह चञ्चलचित्त विषय-वासनाओं की ओर न जाकर स्थिर होने लगता है।

हे सोम! तू ऊर्ध्वगतिवाला ही हो, जिससे (देवासः) = लोग पवित्र हृदय व दिव्य गुणोंवाले बनकर (हि) = निश्चय से (कम्) = उस आनन्दमय प्रभु को (शृणवन्) = सुनें । पवित्र हृदय में प्रभु की वाणी सुनाई पड़ती है। एवं, सोम की ऊर्ध्वगति के अगले परिणाम हैं- ४. मनुष्य दिव्य गुणोंवाला बनता है ५. हृदयस्थ प्रभु की आनन्दमयी वाणी को सुनता है ।
Essence
वृष्टिजलों से उत्पन्न सात्त्विक अन्न हममें उस सोम को जन्म दे जो ऊर्ध्वगतिवाला होकर १. हमें बल व प्राणशक्तिसम्पन्न करे, २. हमारे हृदयों को पवित्र बनाये, ३. हमारे चित्तों को शान्त करे, ४. दिव्य गुणसम्पन्न बनानेवाला हो और ५. हमें प्रभुवाणी श्रवण में प्रवृत्त करे ।
Subject
सोमों की श्रृंखला