Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1437

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- कविर्भार्गवः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
घृ꣣तं꣡ प꣢वस्व꣣ धा꣡र꣢या य꣣ज्ञे꣡षु꣢ देव꣣वी꣡त꣢मः । अ꣣स्म꣡भ्यं꣢ वृ꣣ष्टि꣡मा प꣢꣯व ॥१४३७॥

घृ꣣त꣢म् । प꣣वस्व । धा꣡र꣢꣯या । य꣣ज्ञे꣡षु꣢ । दे꣣ववी꣡त꣢मः । दे꣣व । वी꣡त꣢꣯मः । अ꣣स्म꣡भ्य꣢म् । वृ꣣ष्टि꣢म् । आ । प꣣व ॥१४३७॥

Mantra without Swara
घृतं पवस्व धारया यज्ञेषु देववीतमः । अस्मभ्यं वृष्टिमा पव ॥

घृतम् । पवस्व । धारया । यज्ञेषु । देववीतमः । देव । वीतमः । अस्मभ्यम् । वृष्टिम् । आ । पव ॥१४३७॥

Samveda - Mantra Number : 1437
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 13; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
आर्यसंस्कृति में वृष्टि और यज्ञ में कार्य-कारण सम्बन्ध समझा जाता है । ('यज्ञात् भवति पर्जन्यः') यज्ञ से पर्जन्य [बादल] बनकर वृष्टि होती है। ('अग्निहोत्रं स्वयं वर्षम्'), यह कोशवाक्य अग्निहोत्र से वृष्टि होने को स्वयंसिद्ध [axiom] के समान मानता है, अत: 'कविर्भार्गव' प्रभु से प्रार्थना करता है—हे प्रभो ! (देववीतमः) = हमारे लिए दिव्य गुणों को अत्यन्त [तम] चाहते हुए [वी] आप (यज्ञेषु) = यज्ञों में (धारया) = धारण के उद्देश्य से (घृतम्) = घृत को (पवस्व) = क्षरित कीजिए । मनुष्य जब स्वार्थ की ओर चलता है तब उसकी विचारधारा यह होती है कि यज्ञों में डालने के स्थान में— अग्नि में स्वाहा करने के स्थान पर मैं उतने घृत को अपने शरीर में डालकर पुष्टि व आनन्द का लाभ क्यों न करूँ? इस मनोवृत्ति से यज्ञों के अभाव में मनुष्य अधिकाधिक स्वार्थी व कृपण बनता जाता है। केवल अपने लिए पकानेवाला मानो पाप का ही भक्षण करता है ('केवलाघो भवति केवलादी'–) यह केवलादी शुद्ध पाप बन जाता है— पाप का पुतला हो जाता है। इसके जीवन से दिव्य गुणों का उन्मूलन हो जाता है । दिव्य गुणों की प्राप्ति के लिए यज्ञिय वातावरण आवश्यक है।

हे प्रभो ! इन यज्ञों के होने पर आप (अस्मभ्यम्) = हमारे लिए (वृष्टिम्) = वृष्टि को (आपव) = क्षरित कीजिए ।
Essence
हम यज्ञ करें, प्रभु वृष्टि करें ।
Subject
वृष्टि और यज्ञ