Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1436

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- कविर्भार्गवः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त꣡या꣢ पवस्व꣣ धा꣡र꣢या꣣ य꣢या꣣ गा꣡व꣢ इ꣣हा꣢गम꣢꣯न् । ज꣡न्या꣢स꣣ उ꣡प꣢ नो गृ꣣ह꣢म् ॥१४३६॥

त꣡या꣢꣯ । प꣣वस्व । धा꣡र꣢꣯या । य꣡या꣢꣯ । गा꣡वः꣢꣯ । इ꣣ह꣢ । आ꣣ग꣡म꣢न् । आ꣢ । ग꣡म꣢꣯न् । ज꣡न्या꣢꣯सः । उ꣡प꣢꣯ । नः꣣ । गृह꣢म् ॥१४३६॥

Mantra without Swara
तया पवस्व धारया यया गाव इहागमन् । जन्यास उप नो गृहम् ॥

तया । पवस्व । धारया । यया । गावः । इह । आगमन् । आ । गमन् । जन्यासः । उप । नः । गृहम् ॥१४३६॥

Samveda - Mantra Number : 1436
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 13; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
वृष्टि के ठीक होने पर सुभिक्ष होता है। सुभिक्ष गोपालनादि में सहायक होता है तथा सब घरों में आनन्द-मङ्गल बना रहता है । इसी भावना को 'कविर्भार्गव' इस रूप में कहता है कि -

हे सोम! आप (तया) = उस (धारया) = धारण करनेवाली वृष्टि जल धारा से (पवस्व) = जलों को आकाश से क्षरित कीजिए (यया) = जिससे (इह) = यहाँ — हमारे घरों में (गाव:) = गौवें (आगमन्) = आएँ । हमें चारे इत्यादि की कमी न होने से गौवों के रखने की सुविधा हो और परिणामत: (न: गृहम् उप) = हमारे घरों के समीप (जन्यासः) = आनन्द-ही-आनन्द [ pleasure, happiness ] हो तथा उनमें प्रेम [Affection] का राज्य हो ।

जिस घर में गौवों का निवास होता है वहाँ १. शरीर स्वस्थ होते हैं, २. मन विशाल होता है तथा ३. बुद्धि तीव्र व सात्त्विक होती है। परिणामतः वहाँ आनन्द द- ही - आनन्द होता है । सब लोग परस्पर प्रेम से रहते हैं ।
Essence
वृष्टि ठीक हो और हम घरों में गौवों को रक्खें, जिससे हममें नीरोगता, निश्छलता व निःस्वार्थता का आनन्द हो और परस्पर प्रेम हो ।
Subject
गौवें आनन्द व प्रेम