Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1433

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
आ꣡ न꣢स्ते गन्तु मत्स꣣रो꣢꣫ वृषा꣣ म꣢दो꣣ व꣡रे꣢ण्यः । स꣣हा꣡वा꣢ꣳ इन्द्र सान꣣सिः꣡ पृ꣢तना꣣षा꣡डम꣢꣯र्त्यः ॥१४३३॥

आ । नः꣣ । ते । गन्तु । मत्सरः꣢ । वृ꣡षा꣢꣯ । म꣡दः꣢꣯ । व꣡रे꣢꣯ण्यः । स꣣हा꣡वा꣢न् । इ꣣न्द्र । सानसिः꣢ । पृ꣣तनाषा꣢ट् । अ꣡र्म꣢꣯त्यः । अ । म꣣र्त्यः ॥१४३३॥

Mantra without Swara
आ नस्ते गन्तु मत्सरो वृषा मदो वरेण्यः । सहावाꣳ इन्द्र सानसिः पृतनाषाडमर्त्यः ॥

आ । नः । ते । गन्तु । मत्सरः । वृषा । मदः । वरेण्यः । सहावान् । इन्द्र । सानसिः । पृतनाषाट् । अर्मत्यः । अ । मर्त्यः ॥१४३३॥

Samveda - Mantra Number : 1433
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 12; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (इन्द्र) = शत्रुओं का विद्रावण करनेवाले प्रभो ! (ते) = आपका यह ‘इन्दु’ – सोम (नः) = हमें (आगन्तु) प्= राप्त हो, जो सोम– १. (मत्सरः) = एक विशेष उल्लास का सञ्चार करनेवाला है, २. (वृषा) = शक्तिशाली व आनन्दों का वर्षक है, ३. (वरेण्यः मदः) = एक वरणीय – बड़ा वाञ्छनीय मद–आनन्दजनक साधन है। इससे उत्पन्न आनन्द स्थायी है— क्षणिक नहीं । ४. (सहावान्) = यह रोगकृमियों का मर्षण करनेवाला है ५. (सानसिः) = अतएव सम्भजनीय है – सेवनीय है । यह सोम प्रत्येक मनुष्य के लिए प्राप्त करने योग्य वस्तु है । ६. (पृतनाषाट्) = यह आसुर सेना का पराभव करनेवाला है- मन के अन्दर आ जानेवाली अशुभ वृत्तियों को कुचल देनेवाला है । ८. (अ-मर्त्यः) = इस प्रकार यह सोम रोगकृमियों का पराभव करके हमें अकालमृत्यु से- रोगादि से बचानेवाला है तथा आसुर वृत्तियों को कुचल देने के कारण यह हमें ऐसा बना देता है कि हम किसी भी भौतिक वस्तु के पीछे मारे-मारे नहीं फिरते [अमर्त्य]।
Essence
सोम हमपर आक्रमण करनेवाले आसुर भावों के सैन्य को पूर्ण पराभव देनेवाला है [पृतनाषाट्] ।
Subject
पृतनाषाट् सोम