Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1431

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- नृमेधपुरुमेधावाङ्गिरसौ Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
आ꣣मा꣡सु꣢ प꣣क्व꣡मैर꣢꣯य꣣ आ꣡ सूर्य꣢꣯ꣳ रोहयो दि꣣वि꣢ । घ꣣र्मं꣡ न सामं꣢꣯ तपता सुवृ꣣क्ति꣢भि꣣र्जु꣢ष्टं꣣ गि꣡र्व꣢णसे बृ꣣ह꣢त् ॥१४३१॥

आ꣣मा꣡सु꣢ । प꣣क्व꣢म् । ऐ꣡र꣢꣯यः । आ । सू꣡र्य꣢꣯म् । रो꣣हयः । दिवि꣢ । घ꣣र्म꣢म् । न । सा꣡म꣢꣯न् । त꣣पता । सुवृक्ति꣡भिः꣢ । सु꣣ । वृक्ति꣡भिः꣢ । जु꣡ष्ट꣢꣯म् । गि꣡र्व꣢꣯णसे । गिः । व꣣नसे । बृहत् ॥१४३१॥

Mantra without Swara
आमासु पक्वमैरय आ सूर्यꣳ रोहयो दिवि । घर्मं न सामं तपता सुवृक्तिभिर्जुष्टं गिर्वणसे बृहत् ॥

आमासु । पक्वम् । ऐरयः । आ । सूर्यम् । रोहयः । दिवि । घर्मम् । न । सामन् । तपता । सुवृक्तिभिः । सु । वृक्तिभिः । जुष्टम् । गिर्वणसे । गिः । वनसे । बृहत् ॥१४३१॥

Samveda - Mantra Number : 1431
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 12; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (आमासु) = वृत्रहनन के द्वारा तू इन अपरिपक्व शरीरों में (पक्वम्) = पक्वता (ऐरयः) = प्राप्त कराता है। वासना के विनष्ट होने पर शरीर के सब अङ्ग सुदृढ़ हो जाते हैं, क्योंकि वासना- विनाश से शरीर में शक्ति सुरक्षित रहती है । २. इस वृत्रहनन के द्वारा ही तू (सूर्यम्) = ज्ञानरूप सूर्य को (दिवि) = मस्तिष्करूप द्युलोक में (आरोहयः) = उदित करता है । वासना विनाश से सुरक्षित सोम ज्ञानाग्नि का ईंधन बनता है और ज्ञानसूर्य अधिक और अधिक दीप्त होता चलता है । ३. इस वृत्रहनन के द्वारा तुम (घर्मं न) = तेजस्विता की भाँति (सामम्) = शान्ति को (सुवृक्तिभिः) = प्रभु स्तुतियों के साथ [नि० २.२४] (तपत) = दीप्त करो । [घृ=दीप्ति, साम–Calmness], अर्थात् वृत्रहत्या का परिणाम हमारे जीवनों में इस रूप में प्रकट होता है कि हम प्रभु-स्तवन करते हैं और हमारे शरीरों में तेजस्विता की दीप्ति प्रकट होती है तथा मन के अन्दर शान्ति का राज्य होता है। यह तेजस्वितावाली शान्ति (गिर्वणसे) = वेदवाणियों के द्वारा स्तुति किये जानेवाले प्रभु के लिए (बृहत् जुष्टम्) = बड़ी प्रिय है। यदि हमारे जीवनों में यह शान्ति होती है तो हम प्रभु के प्रिय बनते हैं।
Essence
हमारे शरीर सुदृढ़ हों, मस्तिष्क में ज्ञानरूप सूर्य का उदय हो, हमें तेजस्विता के साथ शान्ति प्राप्त हो, हम प्रभु-स्तवन करते हुए प्रभु के प्रिय हों ।
Subject
तेजस्वितावाली शान्ति