Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1426

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ꣣भि꣢ वा꣣युं꣢ वी꣣꣬त्य꣢꣯र्षा गृणा꣣नो꣢३꣱ऽभि꣢ मि꣣त्रा꣡वरु꣢꣯णा पू꣣य꣡मा꣢नः । अ꣣भि꣡ न꣢꣯रं धी꣣ज꣡व꣢नꣳ रथे꣣ष्ठा꣢म꣣भी꣢न्द्रं꣣ वृ꣡ष꣢णं꣣ व꣡ज्र꣢बाहुम् ॥१४२६॥

अ꣣भि꣢ । वा꣣यु꣢म् । वी꣣ति꣢ । अ꣣र्ष । गृणानः꣢ । अ꣣भि꣢ । मि꣣त्रा꣢ । मि꣣ । त्रा꣢ । व꣡रु꣢꣯णा । पू꣣य꣡मा꣢नः । अ꣣भि꣢ । न꣡र꣢꣯म् । धी꣣ज꣡व꣢नम् । धी꣣ । ज꣡व꣢꣯नम् । र꣣थेष्ठा꣢म् । र꣣थे । स्था꣢म् । अ꣡भि꣢꣯ । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । वृ꣡ष꣢꣯णम् । व꣡ज्र꣢꣯बाहुम् । व꣡ज्र꣢꣯ । बा꣣हुम् ॥१४२६॥

Mantra without Swara
अभि वायुं वीत्यर्षा गृणानो३ऽभि मित्रावरुणा पूयमानः । अभि नरं धीजवनꣳ रथेष्ठामभीन्द्रं वृषणं वज्रबाहुम् ॥

अभि । वायुम् । वीति । अर्ष । गृणानः । अभि । मित्रा । मि । त्रा । वरुणा । पूयमानः । अभि । नरम् । धीजवनम् । धी । जवनम् । रथेष्ठाम् । रथे । स्थाम् । अभि । इन्द्रम् । वृषणम् । वज्रबाहुम् । वज्र । बाहुम् ॥१४२६॥

Samveda - Mantra Number : 1426
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 12; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि 'कुत्स' है, जो सब अशिव भावनाओं को [कुथ हिंसायाम्] हिंसित कर देता है । १. यह कहता है कि (वीति) = वीतये=गतिशीलता के लिए [वी-गति] (वायुम् अभि अर्ष) ='वायु' की ओर जानेवाला बन । [वा-गतिगन्धनयोः] । गतिशील–‘स्वाभाविकी ज्ञानबल क्रिया च'– स्वाभाविकरूप से क्रियावाले प्रभु का ध्यान कर । इस गतिशीलता के द्वारा तू अपनी सब बुराइयों का गन्धन–हिंसन करनेवाला हो । वायु नाम से (गृणान:) = स्तुति करता हुआ तू भी 'वायु' सदृश ही बन जाएगा। २. (पूयमानः) = अपने को पवित्र करता हुआ तू वीतये – सब बुराइयों को परे फेंकने के लिए [वी-असन] (मित्रावरुणा अभि अर्ष) = मित्र और वरुण नामक प्रभु की ओर गतिवाला बन । प्रभु ‘मित्र' इसलिए हैं कि वे सभी के साथ स्नेह करते हैं, 'वरुण' इस लिए कि वे द्वेष का निवारण करते हैं। इस रूप में प्रभु का स्मरण करता हुआ कुत्स भी राग-द्वेष को परे फेंककर सबके साथ स्नेह से वर्तता है और पवित्र जीवनवाला होता है ३. (वीतये) = अपने प्रकृष्ट विकास के लिए (नर) = [नृ नये ] सबको आगे ले-चलनेवाले (धीजवनम्) = [जवन=Quickness] बुद्धि की मन्दता को दूर करनेवाले (रथेष्ठाम्) = शरीररूप रथ पर सारथि के रूप में स्थित प्रभु की ओर (अभिअर्ष) = जानेवाला बन । तू प्रभु को ही अपना सारथि बना, जिससे तेरी सब शक्तियों का विकास ठीक ढङ्ग से हो । प्रभु के हाथ में लगाम होगी तो अवनति का प्रश्न होता ही नहीं । ४. हे कुत्स ! तू (इन्द्र) = उस सर्वशक्तिमान् (वृषणम्) = शक्तिशाली (वज्रबाहुम्) = बाहुओं में वज्र लिये हुए प्रभु की ओर (अभिअर्ष) = गति कर | बुराइयों के नष्ट करनेवाले प्रभु का स्मरण 'वीतये' – पवित्रता [Cleaning] के लिए आवश्यक ही है ।
Essence
प्रभु के भिन्न-भिन्न नामों का स्मरण करते हुए हम अपने जीवन के लिए प्रेरणा प्राप्त करें ।
Subject
विविध नामों द्वारा प्रभु-स्मरण