Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 142

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- प्रगाथः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
क्वा꣢३꣱स्य꣡ वृ꣢ष꣣भो꣡ युवा꣢꣯ तुवि꣣ग्री꣢वो꣣ अ꣡ना꣢नतः । ब्र꣣ह्मा꣡ कस्तꣳ स꣢꣯पर्यति ॥१४२॥

क्व꣢꣯ । स्यः । वृ꣣षभः꣢ । यु꣡वा꣢꣯ । तु꣣विग्री꣡वः꣢ । तु꣣वि । ग्री꣡वः꣢꣯ । अ꣡ना꣢꣯नतः । अन् । आ꣣नतः । ब्रह्मा꣢ । कः । तम् । स꣣पर्यति ॥१४२॥

Mantra without Swara
क्वा३स्य वृषभो युवा तुविग्रीवो अनानतः । ब्रह्मा कस्तꣳ सपर्यति ॥

क्व । स्यः । वृषभः । युवा । तुविग्रीवः । तुवि । ग्रीवः । अनानतः । अन् । आनतः । ब्रह्मा । कः । तम् । सपर्यति ॥१४२॥

Samveda - Mantra Number : 142
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
गत मन्त्र में ऐसी सम्पत्ति की आराधना थी जोकि विकास की साधिका है। इस मन्त्र

में विकास का उल्लेख है। हमें उन्नति का ठीक-ठीक भाव ज्ञात नहीं । सामान्यतः अधिक धन-प्राप्ति को ही हम उन्नति समझते हैं। यह बात तथ्य से बहुत दूर है। उन्नत पुरुष का चित्रण प्रस्तुत मन्त्र में 'वृषभ, युवा, तुविग्रीव, अनानत, और ब्रह्मा' इन पाँच शब्दों में किया गया है। इनकी भावना इस प्रकार है

१.(वृषभः) = इस शब्द का सामान्य अर्थ बैल होता है। बैल शक्ति का प्रतीक है। शेर अपने नेत्र, पंजो व दाढ़ों के कारण भले ही बैल को मार ले, परन्तु वह बैल की भाँति अस्सी मन[तीन टन] बोझ को नहीं खेंच सकता । यह घोड़े के लिए भी असम्भव है। एवं, शक्तिशाली शरीरवाला पुरुष ‘वृषभ' है। इसकी शक्ति औरों पर सुखों की वर्षा करनेवाली है - बैल की शक्ति भी औरों के लिए अन्न आदि के उत्पन्न करने में व्यय होती है। [वृष्-वर्षा करना] 

२. (युवा) = यह शब्द 'यु' धातु से बना है। इसका अर्थ है [१] मिश्रण और [२] अमिश्रण, मिलना और अलग होना । ('सं मा भद्रेण पृङद्मम् वि मा पाप्माना पृङद्मम्')=भद्र से संपृक्त होना, और अभद्र से पृथक् होना। जो व्यक्ति अपनी इन्द्रियों को शुभ कार्यों में युक्त करके अशुभ कार्यों से पृथक् करता है, वह युवा है। प्राणमयकोश के विकास का अभिप्राय यही है।

३. (तुविग्रीवः)=मनोमयकोश के विकास का संकेत 'तुविग्रीवः' शब्द कर रहा है। ‘तुवि' का अर्थ है 'बहुत'। ग्रीवा का अर्थ है गरदन | तुविग्रीव:- बहुत गर्दनोंवालना। जो व्यक्ति अपने मन में सभी के लिए प्रेम धारण करता है - सभी में आत्मबुद्धि करता है - है - वह तुविग्रीव है | इस प्रकार मन को रागद्वेष से शून्य बनाना ही मनोमयकोश का विकास है।

४. (अनानतः)=इस शब्द का अर्थ है 'नहीं दबा हुआ'। जो भी पुरुष अपने को ज्ञान-सम्पन्न बनाता है, उसमें खुशामद या दबकर कुछ करने की वृत्ति स्वतः समाप्त हो जाती है। यह न दबता है, न किसी को दबाता है।

५. (ब्रह्मा) = बृहि वृद्धौ से बनकर ब्रह्मा शब्द "खूब बढ़े हुए का" वाचक है। ('यो वे भूमा तत्सुखम्') बढ़े हुए होने के कारण इसका जीवन आनन्दमय होता है | ('वसुधैव कुटुम्बकम्') = यह सारी वसुधा को अपना परिवार समझकर चलता है।

यह पञ्चविध विकास करनेवाला संसार में 'आश्चर्यवत्' ही कोई होता है। यही बात मन्त्र में क्(व स्यः)=कहाँ है वह? इन प्रश्नात्मक शब्दों से कही गई है। (तम्) = इस व्यक्ति का तो कः=आनन्दस्वरूप प्रभु भी (सपर्यति) = आदर करते हैं।
Essence
पञ्चविध विकास करके हम प्रभु के आदर- पात्र बनें।
Subject
पञ्चविध विकास