Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1417

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स꣡ वाजं꣢꣯ वि꣣श्व꣡च꣢र्षणि꣣र꣡र्व꣢द्भिरस्तु꣣ त꣡रु꣢ता । वि꣡प्रे꣢भिरस्तु꣣ स꣡नि꣢ता ॥१४१७॥

सः । वा꣡ज꣢꣯म् । वि꣣श्व꣡च꣢र्षणिः । वि꣢श्व꣢ । च꣣र्षणिः । अ꣡र्व꣢꣯द्भिः । अ꣡स्तु । त꣡रु꣢꣯ता । वि꣡प्रे꣢꣯भिः । वि । प्रे꣢भिः । अस्तु । स꣡नि꣢꣯ता ॥१४१७॥

Mantra without Swara
स वाजं विश्वचर्षणिरर्वद्भिरस्तु तरुता । विप्रेभिरस्तु सनिता ॥

सः । वाजम् । विश्वचर्षणिः । विश्व । चर्षणिः । अर्वद्भिः । अस्तु । तरुता । विप्रेभिः । वि । प्रेभिः । अस्तु । सनिता ॥१४१७॥

Samveda - Mantra Number : 1417
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 12; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(सः) = वह (विश्वचर्षणिः) = [चर्षणि=Seeing, observing] संसार को सूक्ष्मता से देखनेवाला प्रभुभक्त (अर्वद्भिः) = इन्द्रियरूप अश्वों के साथ निरन्तर चलनेवाले (वाजम्) = संग्राम को (तरुता अस्तु) = सफलता से पार करनेवाला हो । जीव का एक अध्यात्मसंग्राम निरन्तर चल रहा है । इन्द्रियाँ ग्रह हैं और विषय अतिग्रह । मनुष्य ने इन्हें जीतना है । ये अत्यन्त प्रबल हैं। मन को हर लेती हैं और मनुष्य हार जाता है, परन्तु यह प्रभुभक्त 'विश्वचर्षणि' है – विश्व को बारीकी से देखता हुआ उनमें फँसता नहीं, और इस प्रकार इन्द्रियों के साथ चल रहे संग्राम को जीत लेता है । इस संग्राम को जीतने के उद्देश्य से ही यह (विप्रेभिः) = अपना पूरण करनेवाले, न्यूनताओं को दूर करनेवाले विद्वान् ब्राह्मणों के साथ (सनिता) = [Worship, honour] आपका सम्भजन करनेवाला अस्तु होता है । प्रभुभक्ति ने ही तो संग्राम में विजय प्राप्त करानी है ।

इस विजय को प्राप्त करके ही व्यक्ति बहिर्मुख न होकर अन्तर्मुख होता है—'आजीगर्ति' बनाता है और इस प्रकार सुख का निर्माण करनेवाला 'शुनः शेप' होता है ।
Essence
विषयों के स्वरूप को गहराई तक देखकर हम उनके प्रति आसक्ति से बचें।
Subject
संग्राम-विजय