Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 141

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- श्यावाश्व आत्रेयः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
अ꣣द्य꣡ नो꣢ देव सवितः प्र꣣जा꣡व꣢त्सावीः꣣ सौ꣡भ꣢गम् । प꣡रा꣢ दुः꣣ष्व꣡प्न्य꣢ꣳ सुव ॥१४१॥

अ꣣द्य꣢ । अ꣣ । द्य꣢ । नः꣣ । देव । सवितरि꣡ति꣢ । प्र꣣जा꣡व꣢त् । प्र꣣ । जा꣡व꣢꣯त् । सा꣣वीः । सौ꣡भ꣢꣯गम् । सौ । भ꣣गम् । प꣡रा꣢꣯ । दु꣣ष्वप्न्य꣢म् । दुः꣣ । स्व꣡प्न्य꣢꣯म् । सु꣣व ॥१४१॥

Mantra without Swara
अद्य नो देव सवितः प्रजावत्सावीः सौभगम् । परा दुःष्वप्न्यꣳ सुव ॥

अद्य । अ । द्य । नः । देव । सवितरिति । प्रजावत् । प्र । जावत् । सावीः । सौभगम् । सौ । भगम् । परा । दुष्वप्न्यम् । दुः । स्वप्न्यम् । सुव ॥१४१॥

Samveda - Mantra Number : 141
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
इस मन्त्र का ऋषि 'श्यावाश्व आत्रेय है। 'श्यैङ् गतौ' धातु से श्याव शब्द बना है और अश्व का अर्थ घोड़ा है। इन्द्रियों को वैदिक साहित्य में अश्व से उपमा दी गई है, अतः गतिशील इन्द्रियोंवाला व्यक्ति श्यावाश्व है। यह क्रियाशील व्यक्ति ‘काम, क्रोध, लोभ' से परे रहता है, अतः यह 'अ-त्रि' व आत्रेय कहलाता है – ' जिसमें तीन नहीं हैं।

पिछले मन्त्र में शक्ति सम्पन्न बनने का उल्लेख था। शक्ति प्राप्त करके वह 'श्रुतकक्ष आङ्गिरस’ आज ‘श्यावाश्व' बनता है। यह श्यावाश्व ‘सौभग'- वितजनदम सम्पत्ति प्राप्त करता है। ‘यह सम्पत्ति उसके ह्रास का कारण न बन जाए' इस हेतु वह प्रभु से आराधना करता है कि (देव सवितः) = दानादि दिव्य गुणों से सम्पन्न प्रेरक देव (नः) = हमारे लिए (अद्य) = आज ही (प्रजावत्) = [जनी प्रादुर्भावे] 'प्रकृष्ट प्रादुर्भाव = उच्च विकास से सम्पन्न (सौभगम्) = सम्पत्ति (सावी:)=प्राप्त कराइए । धन से मैं विज्ञानमय, मनोमय, प्राणमय कोशों की वृद्धि के लिए अनुकूल साधनों को जुटाता हुआ अन्नमयकोश के स्वास्थ्य के लिए भी सामग्री का संग्रह करूँ। हे प्रभो! आप देव हैं, देनेवाले हैं। आप तो अपने लिए कुछ भी बचाते नहीं हैं, आपसे प्रेरणा प्राप्त करके मैं भी देनेवाला बनूँ।

हे प्रभो। इस प्रकार मुझे दानवृत्तिवाला बनाकर आप मुझसे (दुःष्वप्न्यम्) = बुरे स्वप्नों के कारणभूत पापों को (परासुव) = दूर कीजिए। यदि मै धन को दान में विनियुक्त न करूँगा तो स्वभावतः विलास व पाप की ओर मेरा झुकाव हो जाएगा और ये पाप मुझे सुख की नींद न सोने देंगे। इनके कारण मैं दुःस्वप्नों को ही देखा करूँगा।
‘दुःस्वप्न्यम्' का अर्थ 'बुरी तरह से सोनेवाली' ' 'अत्यन्त असंज्ञभूत' वृक्षादि योनि का कारण भी है। हम धन प्राप्त करके उन पापों में न फँस जाएँ जो हमें वृक्षादि स्थावर योनि को प्राप्त कराने का कारण बनें।
Essence
हमारा धन हमारे विकास के लिए हो, न कि विलास और परिणामतः विनाश के लिए।
Subject
विकास के अनुकूल सम्पत्ति