Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1407

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- सुतंभर आत्रेयः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त्व꣡म꣢ग्ने स꣣प्र꣡था꣢ असि꣣ जु꣢ष्टो꣣ हो꣢ता꣣ व꣡रे꣢ण्यः । त्व꣡या꣢ य꣣ज्ञं꣡ वि त꣢꣯न्वते ॥१४०७॥

त्वम् । अ꣣ग्ने । सप्र꣡थाः꣢ । स꣣ । प्र꣡थाः꣢꣯ । अ꣣सि । जु꣡ष्टः꣢꣯ । हो꣡ता꣢꣯ । व꣡रे꣢꣯ण्यः । त्व꣡या꣢꣯ । य꣣ज्ञ꣢म् । वि । त꣣न्वते ॥१४०७॥

Mantra without Swara
त्वमग्ने सप्रथा असि जुष्टो होता वरेण्यः । त्वया यज्ञं वि तन्वते ॥

त्वम् । अग्ने । सप्रथाः । स । प्रथाः । असि । जुष्टः । होता । वरेण्यः । त्वया । यज्ञम् । वि । तन्वते ॥१४०७॥

Samveda - Mantra Number : 1407
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 12; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (अग्ने) = अग्रेणीः–मोक्षप्रापक – प्रभो ! (त्वम्) = आप १. (सप्रथाः) = सर्वतः पृथु - सब दृष्टिकोणों से विस्तृत (असि) = हो – क्या ज्ञान, क्या धन, क्या बल सभी आपमें निरपेक्षरूप से रह रहे हैं— आप इन सब गुणों की चरम सीमा हो । आपमें ये सब निरतिशयरूप से हैं । २. (जुष्ट:) = आप भक्तों से प्रीतिपूर्वक सेवित होते हैं तथा सब भक्तों को कल्याण प्राप्त करानेवाले हैं । ३. (होता) = आप ही प्रत्येक आवश्यक वस्तु के देनेवाले हैं— हमें उन्नति के लिए कौन-सी आवश्यक वस्तु आपने नहीं प्राप्त करायी । ४. (वरेण्यः) = आप ही वरणीय हैं [नि० १२.१३] । सामान्यतः धीरता की न्यूनता के कारण और श्रेयमार्ग की उपेक्षा से जीव प्रकृति का वरण करता है, परन्तु जब उसके पाँवों तले रौंदा जाता है तब अनुभव करता है कि वरणीय तो प्रभु थे, मैंने वरण किया प्रकृति का ।

ये सुतम्भर लोग इस प्रकार आपको 'सप्रथाः, जुष्टः, होता व वरेण्यः' रूप में देखकर (त्वया) = आपकी सहायता से (यज्ञं वितन्वते) = यज्ञों का विस्तार करते हैं। प्रकृति को अपनाने का परिणाम 'स्वार्थ' की वृद्धि है - मनुष्य में स्वार्थ बढ़ता जाता है। प्रभु को अपनाने से यज्ञिय वृत्ति बढ़ती है और स्वार्थ उत्तरोत्तर क्षीण होता जाता है। स्वार्थ की वृत्ति 'चार दिन की चाँदनी के बाद अँधेरी रात' को ले-आती है और यज्ञियवृत्ति उत्तरोत्तर प्रकाश को बढ़ानेवाली होती है ।
Essence
हम प्रभु को ‘सप्रथा:' रूप में स्मरण कर प्रथित= विस्तृत हृदयवाले बनें, 'जुष्ट: ' रूप में स्मरण कर सबके साथ प्रीतिपूर्वक वर्तनेवाले बनें ‘होता' रूप में स्मरण कर देनेवाले हों और इस प्रकार हममें यज्ञिय भावना बढ़े, परन्तु साथ ही उन यज्ञों का हमें अहंकार न हो, अत: हम यह न भूलें कि सब यज्ञ प्रभुकृपा से ही हो रहे हैं ।
 
Subject
यज्ञिय भावना