Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1404

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- तिरश्चीराङ्गिरसः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
इ꣡न्द्र꣢ शु꣣द्धो꣡ हि नो꣢꣯ र꣣यि꣢ꣳ शु꣣द्धो꣡ रत्ना꣢꣯नि दा꣣शु꣡षे꣢ । शु꣣द्धो꣢ वृ꣣त्रा꣡णि꣢ जिघ्नसे शु꣣द्धो꣡ वाज꣢꣯ꣳ सिषाससि ॥१४०४॥

इ꣡न्द्र꣢꣯ । शुद्धः । हि । नः꣣ । रयि꣢म् । शु꣣द्धः꣢ । र꣡त्ना꣢꣯नि । दा꣣शु꣡षे꣢ । शु꣣द्धः꣢ । वृ꣣त्रा꣡णि꣢ । जि꣣घ्नसे । शुद्धः꣢ । वा꣡ज꣢꣯म् । सि꣣षाससि ॥१४०४॥

Mantra without Swara
इन्द्र शुद्धो हि नो रयिꣳ शुद्धो रत्नानि दाशुषे । शुद्धो वृत्राणि जिघ्नसे शुद्धो वाजꣳ सिषाससि ॥

इन्द्र । शुद्धः । हि । नः । रयिम् । शुद्धः । रत्नानि । दाशुषे । शुद्धः । वृत्राणि । जिघ्नसे । शुद्धः । वाजम् । सिषाससि ॥१४०४॥

Samveda - Mantra Number : 1404
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 12; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशाली प्रभो ! (शुद्धः) = आप पूर्ण शुद्ध हैं । (हि) = निश्चय से (न:) = हमें (रयिम्) = धन को (सिषाससि ) = देना चाहते हैं। यदि हम अपने जीवनों को शुद्ध बनाते हैं – नित्य सत्त्वस्थ होने का प्रयत्न करते हैं तो आप हमारे योगक्षेम का अवश्य ध्यान करते । २. हे प्रभो ! (शुद्धः) = आप पूर्ण शुद्ध हो (दाशुषे) = आपके प्रति अपना अर्पण करनेवाले के लिए आप (रत्नानि) = रत्नों को (सिषाससि) = देने की कामना करते हैं। प्रभुभक्त को सदा उत्तम रमणीय धन प्राप्त होते ही रहते हैं । ३. हे प्रभो ! (शुद्धः) = आप तो पूर्ण शुद्ध हैं ही। आप हमारे भी (वृत्राणि) = ज्ञान के आवरणभूत कामादि को जिघ्नसे नष्ट करते हैं। शुद्ध प्रभु का स्तवन हमारे जीवनों को भी शुद्ध बनाता है और उसमें से वासनाओं का उन्मूलन कर देता है। ४. हे प्रभो ! (शुद्धः) = पूर्ण शुद्ध आप हमें भी (वाजं सिषाससि) = वह शक्ति, त्याग व ज्ञान देते हैं जो हमें भी शुद्ध बना देता है। वाज शब्द के तीनों ही अर्थ हैं । शक्ति शरीर को शुद्ध बनाती है, त्याग मन को तथा ज्ञान बुद्धि को ।
Essence
हम शुद्ध जीवनवाले बनकर शुद्ध मार्ग से ही धन कमानेवाले बनें ।
Subject
शुद्धता Purification [शुद्धीकरण ]