Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 14

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
उ꣡प꣢ त्वाग्ने दि꣣वे꣡दि꣢वे꣣ दो꣡षा꣢वस्तर्धि꣣या꣢ व꣣य꣢म् । न꣢मो꣣ भ꣡र꣢न्त꣣ ए꣡म꣢सि ॥१४॥

उ꣡प꣢꣯ । त्वा꣣ । अग्ने । दिवे꣡दि꣢वे । दि꣣वे꣢ । दि꣣वे । दो꣡षा꣢꣯वस्तः । दो꣡षा꣢꣯ । व꣣स्तः । धिया꣢ । व꣣य꣢म् । न꣡मः꣢꣯ । भ꣡र꣢꣯न्तः । आ । इ꣣मसि ॥१४॥

Mantra without Swara
उप त्वाग्ने दिवेदिवे दोषावस्तर्धिया वयम् । नमो भरन्त एमसि ॥

उप । त्वा । अग्ने । दिवेदिवे । दिवे । दिवे । दोषावस्तः । दोषा । वस्तः । धिया । वयम् । नमः । भरन्तः । आ । इमसि ॥१४॥

Samveda - Mantra Number : 14
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (अग्ने! दोषावस्त:)= [वस आच्छादने, छद् अपवारणे] दोषों को समन्तात् अपवारित दूर करनेवाले प्रभो! आप हमारे लिए उस छत के समान हैं जो ओलों आदि से बचाती है; उसी के समान आप सब ओर से आक्रमण करनेवाले दोषों से हमें बचाते हैं। (वयम्)=कर्मतन्तु का विच्छेद न करनेवाले आपके भक्त हम (दिवेदिवे)= प्रतिदिन त्(वा उप)= आपके समीप (धिया)= ज्ञानपूर्वक कर्म से (नमः भरन्तः)= विनय का सम्पादन करते हुए (एमसि)= प्राप्त होते हैं। प्रभु 'दोषावस्त:' हमें सब ओर से सदा दोषों से बचाते हैं, परन्तु उसके लिए हमारा कर्तव्य है कि हम सदा ‘धिया' ज्ञानपूर्वक कर्म में लगे रहें। धी शब्द ज्ञान और कर्म दोनों ही अर्थों का वाचक है। मनुष्य शब्द का निर्वचन भी यास्क ने 'मत्वा (कर्माणि सीव्यति')= ‘सोचकर कर्म करता है'–यह किया है। एवं, धिया शब्द की भावना को अपनाने से ही हम अपने मनुष्य नाम को चरितार्थ करते हैं। हमें “Man proposes and God disposes”, अन्यथा चिन्तितं यत्तु अन्यथैव प्रजायते”, “चाहा कुछ हुआ कुछ" का अनुभव इसी परिणाम पर पहुँचाता है कि संचालक शक्ति कोई और है। ऐसी ही घटनाएँ हमारे अभिमान को तोड़कर हमें नतमस्तक कर देती हैं, और हम विनीत होकर उस प्रभु के समीप उपस्थित होते हैं। हमारा अभिमान गल जाता है और हम आसुर भावनाओं को छोड़कर उत्तम इच्छाओंवाले बनते हुए इस मन्त्र के ऋषि ‘मधुच्छन्दाः' होते हैं। 
Essence
ज्ञानपूर्वक कर्म ही प्रभु की सच्ची विनय है।
Subject
ज्ञानपूर्वक कर्म ही उपासना है