Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1397

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ग꣡र्भे꣢ मा꣣तुः꣢ पि꣣तु꣢ष्पि꣣ता꣡ वि꣢दिद्युता꣣नो꣢ अ꣣क्ष꣡रे꣢ । सी꣡द꣢न्नृ꣣त꣢स्य꣣ यो꣢नि꣣मा꣢ ॥१३९७॥

ग꣡र्भे꣢꣯ । मा꣣तुः꣢ । पि꣣तुः꣢ । पि꣣ता꣢ । वि꣣दिद्युतानः꣢ । वि꣣ । दिद्युतानः꣢ । अ꣣क्ष꣡रे꣢ । सी꣡द꣢꣯न् । ऋ꣣त꣡स्य꣢ । यो꣡नि꣢꣯म् । आ ॥१३९७॥

Mantra without Swara
गर्भे मातुः पितुष्पिता विदिद्युतानो अक्षरे । सीदन्नृतस्य योनिमा ॥

गर्भे । मातुः । पितुः । पिता । विदिद्युतानः । वि । दिद्युतानः । अक्षरे । सीदन् । ऋतस्य । योनिम् । आ ॥१३९७॥

Samveda - Mantra Number : 1397
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 12; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
यह सिद्धान्त अब सुज्ञात है कि बालक का वास्तविक निर्माण मातृगर्भ में ही होता है । उस समय माता की एक-एक क्रिया बच्चे को प्रभावित कर रही होती है । 'दिवास्वपन्त्याः स्वापशीलः ' इत्यादि ब्राह्मणग्रन्थों के वाक्य इस सिद्धान्त को पुष्ट कर रहे हैं। मन्त्र कहता है कि (मातुः गर्भे) = माता के गर्भ में ही बालक (पितुः पिता) = पिता का पिता, अर्थात् ऊँचे-से-ऊँचा ज्ञानी बन सकता है । वहाँ इसकी शिक्षा के ठीक होने पर यह संसार में आ-आता है, कैसा बनकर ? १. (अक्षरे विदिद्युतानः) = अक्षरों में विशेषरूप से देदीप्यमान, अर्थात् अनक्षर [Illiterate नहीं, साक्षर literate] = विद्वान् तथा २. (ऋतस्य योनिम् आसीदन्) = ऋत के स्थान में निवास करता हुआ ।

इस कथन से स्पष्ट है कि माता चाहे तो बालक को ऊँचे-से-ऊँचा ज्ञानी तथा संयमी बना सकती है। संस्कृत साहित्य में ज्ञानी को 'पिता' कहते हैं । यह बालक ज्ञानियों का भी ज्ञानी बनने से ‘पितुः पिता' कहा गया है। ‘ऋत' का अभिप्राय 'ठीक स्थान पर तथा ठीक समय पर' है। माता चाहे तो बालक को इस प्रकार बड़ा मर्यादामय जीवनवाला बना सकती है । एवं, ज्ञानी और संयमी पुरुष का निर्माण तो मातृगर्भ में ही होता है। जिस प्रकार दो अरणियों के सम्पर्क से भौतिक अग्नि की उत्पत्ति होती है उसी प्रकार माता-पितारूप अरणियों से सन्तानरूप अग्नि का उद्भावन होता है। मातृरूप अरणि ने इस सन्तानाग्नि को बड़ा देदीप्यमान तथा ॠत की योनि में स्थित होनेवाला बनाना है ।
Essence
माताएँ चाहें तो बच्चों को ऊँचे-से-ऊँचा ज्ञानी व संयमी बना सकती हैं। 
 
Subject
'अग्नि' का निर्माण मातृगर्भ में