Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1396

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣣ग्नि꣢र्वृ꣣त्रा꣡णि꣢ जङ्घनद्द्रविण꣣स्यु꣡र्वि꣢प꣣न्य꣡या꣢ । स꣡मि꣢द्धः शु꣣क्र꣡ आहु꣢꣯तः ॥१३९६॥

अ꣣ग्निः꣢ । वृ꣣त्रा꣡णि꣢ । ज꣣ङ्घनत् । द्रविणस्युः꣢ । वि꣣पन्य꣡या꣢ । स꣡मि꣢꣯द्धः । सम् । इ꣣द्धः । शुक्रः꣢ । आ꣡हु꣢꣯तः ॥१३९६॥

Mantra without Swara
अग्निर्वृत्राणि जङ्घनद्द्रविणस्युर्विपन्यया । समिद्धः शुक्र आहुतः ॥

अग्निः । वृत्राणि । जङ्घनत् । द्रविणस्युः । विपन्यया । समिद्धः । सम् । इद्धः । शुक्रः । आहुतः ॥१३९६॥

Samveda - Mantra Number : 1396
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 12; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
मन्त्र संख्या ४ पर इसका अर्थ इस प्रकार है- (अग्निः) = आगे ले-चलनेवाले वे प्रभु (वृत्राणि) = ज्ञान की आवरक वासनाओं को (जंघनत्) = नष्ट करते हैं। वे प्रभु (द्रविणस्युः) = हमारे संचित द्रविण को चाहते हैं, अर्थात् हम धन को प्रभु- अर्पण कर दें । (विपन्यया) = इस विशिष्ट स्तुति के द्वारा वे प्रभु हमारे वृत्रों का नाश करते हैं । वे प्रभु १. (समिद्धः) = हममें दीप्त होते हैं । २. (शुक्रः) = हमसे जाए जाते हैं और ३. (आहुत:) = हमसे समर्पित होते हैं।
Essence
हम अपना सब कुछ प्रभु को सौंपें । प्रभु हमारे शत्रुओं का विनाश करेंगे ।
Subject
वृत्र-विनाश