Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1387

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- प्रजापतिर्वैश्वामित्रो वाच्यो वा Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
आ꣢ जा꣣मि꣡रत्के꣢꣯ अव्यत भु꣣जे꣢꣫ न पु꣣त्र꣢ ओ꣣꣬ण्योः꣢꣯ । स꣡र꣢ज्जा꣣रो꣡ न योष꣢꣯णां व꣣रो꣢ न योनि꣢꣯मा꣣स꣡द꣢म् ॥१३८७॥

आ꣢ । जा꣣मिः꣢ । अ꣡त्के꣢꣯ । अ꣣व्यत । भुजे꣢ । न । पु꣣त्रः꣢ । पु꣣त् । त्रः꣢ । ओ꣣ण्योः꣣꣬ । स꣡र꣢꣯त् । जा꣣रः꣢ । न । यो꣡ष꣢꣯णाम् । व꣣रः꣢ । न । यो꣡नि꣢꣯म् । आ꣣स꣡द꣢म् । आ꣣ । स꣡द꣢꣯म् ॥१३८७॥

Mantra without Swara
आ जामिरत्के अव्यत भुजे न पुत्र ओण्योः । सरज्जारो न योषणां वरो न योनिमासदम् ॥

आ । जामिः । अत्के । अव्यत । भुजे । न । पुत्रः । पुत् । त्रः । ओण्योः । सरत् । जारः । न । योषणाम् । वरः । न । योनिम् । आसदम् । आ । सदम् ॥१३८७॥

Samveda - Mantra Number : 1387
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 12; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
मनुष्य इस संसार में न जाने कहाँ-कहाँ भटकता है। इधर-उधर भटकने से ही उसका नाम ‘जामि' हुआ है [जमतेर्गतिकर्मणः]। यह भटकता हुआ जीव प्रभु चरणों में ही रक्षण पाता है। मन्त्र में कहते हैं कि (आजामि:) = नाना विषयों में चारों ओर भटकनेवाला यह जीव (अत्के) = उस सतत गतिशील–स्वाभाविकी क्रियावाले प्रभु के चरणों में उपस्थित होकर ही (अव्यत)= रक्षित होता है, (न) = उसी प्रकार जैसेकि (पुत्रः) = पुत्र (ओण्योः) = द्यावापृथिवी [द्यौष्पिता, पृथिवी माता] के तुल्य मातापिता की (भुजे) = भुजाओं में ।

‘इस रक्षा के पाने पर जीव के जीवन में क्या अन्तर आ जाता है, इसका उत्तर बहुत काव्यमय भाषा में देते हैं कि आज तक जो (जारः न) = अपनी शक्तियों को जीर्ण करनेवाला – वासना का शिकार - सा बना हुआ (योषणां सरत्) = पर-दाराओं के प्रति जा रहा था, भोगविलास में ग्रसित था, वह भोगासक्त पुरुष सब भोगों को तिलाञ्जलि देकर (वरः न) = एक वर पुरुष की भाँति (योनिम् आसदत्) = अपने घर पर स्थित हुआ है। अब वह पर-दाराभिमर्षण से परे हो गया है। अब वह वासनाओं से दूर होकर

उत्तम चरित्रवाला बनकर घर पर ही सदाचारपूर्वक निवास करता है, इधर-उधर भटकता नहीं । अब यह वस्तुत: उत्तम सन्तानों का पिता–रक्षक बनकर प्रजापति नामवाला हुआ है— सबके प्रति प्रेम से चलता हुआ 'वैश्वामित्र' है और प्रशंसनीय जीवनवाला होने से ‘वाच्य' है। 
Essence
विषयों में भटकनेवाला प्रभु चरणों में शरण पाकर सुरक्षित हो जाता है, जार वर बन जाता है। घर से बाहर इधर-उधर भटकनेवाला घर पर शान्त होकर रहनेवाला हो जाता है। 
Subject
कितना परिवर्तन ?