Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1382

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उ꣣त꣡ ब्रु꣢वन्तु ज꣣न्त꣢व꣣ उ꣢द꣣ग्नि꣡र्वृ꣢त्र꣣हा꣡ज꣢नि । ध꣣नञ्जयो꣡ रणे꣢꣯रणे ॥१३८२॥

उ꣣त꣢ । ब्रु꣣वन्तु । जन्त꣡वः꣢ । उत् । अ꣣ग्निः꣢ । वृ꣣त्र꣢हा । वृ꣣त्र । हा꣢ । अ꣣जनि । धनञ्जयः꣢ । ध꣣नम् । जयः꣢ । र꣡णे꣢꣯रणे । र꣡णे꣢꣯ । र꣢णे ॥१३८२॥

Mantra without Swara
उत ब्रुवन्तु जन्तव उदग्निर्वृत्रहाजनि । धनञ्जयो रणेरणे ॥

उत । ब्रुवन्तु । जन्तवः । उत् । अग्निः । वृत्रहा । वृत्र । हा । अजनि । धनञ्जयः । धनम् । जयः । रणेरणे । रणे । रणे ॥१३८२॥

Samveda - Mantra Number : 1382
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 12; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(उत) = प्रभु कहते कि मेरी कामना [would that] है कि (जन्तवः) = जन्म लेनेवाले व्यक्ति (ब्रुवन्तु) = [ब्रू=व्यक्तायां वाचि] वेदमन्त्रों का स्पष्ट उच्चारण करें । ज्ञानप्राप्ति का क्रम ही यह था कि शैशव में गुरु से उच्चरित मन्त्रों का शिष्य उच्चारण करते थे। ज्ञानप्राप्ति का यही तो मुख्य द्वार था । इस उच्चारण प्रक्रिया का परिणाम यह होगा कि (अग्निः) = ज्ञानाग्नि (उदजनि) = उत्कृष्टरूप से प्रज्वलित होकर (वृत्रहा) = ज्ञान के आवरक काम का ध्वंस कर डालेगी।

यह वसिष्ठ—जिसके जीवन में इस ज्ञानाग्नि का प्रकाश फैलता है - (रणे-रणे) = वासनाओं से चलनेवाले प्रत्येक रण में (धनं जय:) = धन का विजेता होता है। प्रत्येक युद्ध में विजय प्राप्त करके यह अपने ज्ञानधन को और अधिक बढ़ानेवाला होता है।
Essence
 हम शैशव से ही मन्त्रोच्चारण करें, जिससे हमारी ज्ञानाग्नि बढ़े और हम वासनाओं के साथ होनेवाले संग्राम में धनों के विजेता हों ।
Subject
मन्त्रोच्चारण, ज्ञान, वासनाविजय