Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1380

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
यः꣡ स्नीहि꣢꣯तीषु पू꣣र्व्यः꣡ सं꣢जग्मा꣣ना꣡सु꣢ कृ꣣ष्टि꣡षु꣢ । अ꣡र꣢क्षद्दा꣣शु꣢षे꣣ ग꣡य꣢म् ॥१३८०॥

यः । स्नीहितीषु । पूर्व्यः । सञ्जग्मानासु । सम् । जग्मानासु । कृष्टिषु । अरक्षत् । दाशुषे । गयम् ॥१३८०॥

Mantra without Swara
यः स्नीहितीषु पूर्व्यः संजग्मानासु कृष्टिषु । अरक्षद्दाशुषे गयम् ॥

यः । स्नीहितीषु । पूर्व्यः । सञ्जग्मानासु । सम् । जग्मानासु । कृष्टिषु । अरक्षत् । दाशुषे । गयम् ॥१३८०॥

Samveda - Mantra Number : 1380
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 12; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(यः) = वे प्रभु (स्नीहीतीषु) = [स्नेहकारिणीषु – द०] परस्पर स्नेह करनेवाली (संजग्मानासु) = सदा मिलकर चलनेवाली (कृष्टिषु) = कृषि आदि उत्पादक श्रम करनेवाली प्रजाओं में (पूर्व्यः) = पूरणता को उत्पन्न करनेवालों में उत्तम हैं। प्रभु हमारे जीवनों को पूर्ण बनाते हैं; बशर्ते कि – १. हम परस्पर स्नेहवाले हों, २. मिलकर चलें, ३. कुछ-न-कुछ निर्माण का कार्य अवश्य करें। जिस घर में लोग परस्पर प्रेम से चलते हैं, एक विचार के होकर मिलकर चलते हैं, जहाँ सब पौरुषवाले होकर आलस्य से दूर रहते हैं उस घर पर सदा प्रभु की कृपादृष्टि बनी रहती है।

(दाशुषे) – दानशील और अन्ततोगत्वा प्रभु के प्रति आत्म-समर्पण करनेवाले व्यक्ति के लिए प्रभु (गयम्) = उत्तम सन्तान को [नि० २.१], उत्तम धनों को [नि० ८.१०], उत्तम गृह को [ नि० ३.४] तथा उत्तम प्राणशक्ति को [प्राणा वै गयाः – श० १४.८.१५.७] (अरक्षत्)– प्राप्त कराते हैं । एक दानशील, प्रभु के प्रति समर्पक का जीवन अत्यन्त सुखी, शान्त, समृद्ध व स्वस्थ होता है। ‘जो देता है—प्रभु उसे देते हैं' इस तत्त्व को राहूगण कभी भूलता नहीं।
Essence
हममें स्नेह, सङ्गति, पुरुषार्थ व दानशीलता हो तो प्रभुकृपा से हमारा जीवन बड़ा फूलता-फलता होगा ।
Subject
‘गय' की प्राप्ति