Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1363

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मेध्यातिथिः काण्वः Chhand- बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती) Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
क꣡ण्वा꣢ इव꣣ भृ꣡ग꣢वः꣣ सू꣡र्या꣢ इव꣣ वि꣢श्व꣣मि꣢द्धी꣣त꣡मा꣢शत । इ꣢न्द्र꣣ꣳ स्तो꣡मे꣢भिर्म꣣ह꣡य꣢न्त आ꣣य꣡वः꣢ प्रि꣣य꣡मे꣢धासो अस्वरन् ॥१३६३॥

क꣡ण्वाः꣢꣯ । इ꣣व । भृ꣡गवः꣢꣯ । सू꣡र्याः꣢꣯ । इ꣣व । वि꣡श्व꣢꣯म् । इत् । धी꣣त꣢म् । आ꣣शत । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । स्तो꣡मे꣢꣯भिः । म꣣ह꣡य꣢न्तः । आ꣣य꣡वः꣢ । प्रि꣣य꣡मे꣢धासः । प्रि꣣य꣢ । मे꣣धासः । अस्वरन् ॥१३६३॥

Mantra without Swara
कण्वा इव भृगवः सूर्या इव विश्वमिद्धीतमाशत । इन्द्रꣳ स्तोमेभिर्महयन्त आयवः प्रियमेधासो अस्वरन् ॥

कण्वाः । इव । भृगवः । सूर्याः । इव । विश्वम् । इत् । धीतम् । आशत । इन्द्रम् । स्तोमेभिः । महयन्तः । आयवः । प्रियमेधासः । प्रिय । मेधासः । अस्वरन् ॥१३६३॥

Samveda - Mantra Number : 1363
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 11; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
उस (विश्वम्) = सम्पूर्ण संसार में, पदार्थमात्र में प्रविष्ट (धीतम्) =[आध्यातम्] सभी से जिसका ध्यान किया गया है, क्योंकि पापात्मा भी कष्ट आने पर प्रभु के आर्तभक्त बनते हैं— सुख में न सही दुःख में तो उसका स्मरण करते ही हैं— अत: सबसे ध्यात उस प्रभु को (इत्) = सचमुच (आशात) = प्राप्त करते हैं। कौन ? १. (कण्वाः इव) = जो पुरुष मेधावियों के समान बनते हैं । २. (भृगवः) = [भ्रस्ज् पाके] जो तपस्या के द्वारा अपना पूर्ण परिपाक करते हैं, तथा ३. (सूर्या: इव) = निरन्तर सरणशील सूर्य के समान जो सदा गतिशील रहते हैं – कभी अकर्मा नहीं बनते । एवं, प्रभु को वे प्राप्त करते हैं जिन्होंने मस्तिष्क, मन व शरीर की साधना ठीक प्रकार से की है। जिनके मस्तिष्क में ज्ञानाग्नि दीप्त हो रही है, जिनका मानस तपःसंचय से पूर्ण पवित्र हो रहा है और जिनका शरीर सूर्य की भाँति निरन्तर कर्मशील बनकर श्रीसम्पन्न बना है [पश्य सूर्यस्य श्रेमाणं यो न तन्द्रयते चरन् ] । ।

ये (आयवः) = गति को अपनानेवाले मनुष्य एक भी क्षण अकर्मण्यता को धारण न करनेवाले (प्रियमेधासः) = जिनको बुद्धि ही प्रिय लगती है, ये उस (इन्द्रम्) = परमैश्वर्यशाली, सर्वशक्तिमान् प्रभु को (स्तोमेभिः) = स्तुतिसमूहों से (महयन्त:) = पूजित करते हुए (अस्वरन्) = वेदमन्त्रों का सुन्दर स्वर में गायन करते हैं । प्रभु की वाणी का इस प्रकार प्रेम से उच्चारण करते हुए ये क्यों उस प्रभु को न प्राप्त करेंगे ? 
Essence
हम 'कण्व, भृगु व सूर्य' बनकर उस सर्वव्यापक, सबसे ध्यातव्य प्रभु को प्राप्त करें। मस्तिष्क, हृदय व हाथ [Head, Heart and Hands] सभी का ठीक विकास करके हम उस पवित्र प्रभु को प्राप्त कर 'मेध्यातिथि' इस अन्वर्थक नामवाले हों ।
 
Subject
कण्व, भृगु व सूर्य