Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1361

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- प्रगाथो घौरः काण्वः Chhand- बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती) Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अ꣣वक्रक्षि꣡णं꣢ वृष꣣भं꣡ य꣢था꣣ जु꣢वं꣣ गां꣡ न च꣢꣯र्षणी꣣स꣡ह꣢म् । वि꣣द्वे꣡ष꣢णꣳ सं꣣व꣡न꣢नमुभयङ्क꣣रं꣡ मꣳहि꣢꣯ष्ठमुभया꣣वि꣡न꣢म् ॥१३६१॥

अवक्रक्षि꣡ण꣢म् । अ꣣व । क्रक्षि꣡ण꣢म् । वृ꣣षभ꣢म् । यथा । जु꣡व꣢꣯म् । गाम् । न । च꣣र्षणीस꣡ह꣢म् । च꣣र्षणि । स꣡ह꣢꣯म् । वि꣣द्वे꣡ष꣢णम् । वि꣣ । द्वे꣡ष꣢꣯णम् । सं꣣व꣡न꣢नम् । स꣣म् । व꣡न꣢꣯नम् । उ꣣भयङ्कर꣢म् । उ꣣भयम् । कर꣢म् । म꣡ꣳहि꣢꣯ष्ठम् । उ꣣भयावि꣡न꣢म् ॥१३६१॥

Mantra without Swara
अवक्रक्षिणं वृषभं यथा जुवं गां न चर्षणीसहम् । विद्वेषणꣳ संवननमुभयङ्करं मꣳहिष्ठमुभयाविनम् ॥

अवक्रक्षिणम् । अव । क्रक्षिणम् । वृषभम् । यथा । जुवम् । गाम् । न । चर्षणीसहम् । चर्षणि । सहम् । विद्वेषणम् । वि । द्वेषणम् । संवननम् । सम् । वननम् । उभयङ्करम् । उभयम् । करम् । मꣳहिष्ठम् । उभयाविनम् ॥१३६१॥

Samveda - Mantra Number : 1361
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 11; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
गत मन्त्र से ‘शंसत, स्तोत' क्रियाओं का अध्याहार हो रहा है। उस प्रभु का ही स्तवन व शंसन करो जो १. (अवकक्षिणम्) = कामादि शत्रुओं के अवकर्षक [dashing down, overcoming] हैं, उनको कुचल [crush] डालनेवाले हैं । २. (वृषभम्) = शक्तिशाली हैं तथा सुखों के वर्षक हैं । ३. (यथाजुवम्) = योग्य, उचित प्रेरणा देनेवाले हैं [यथा=योग्य] । ४. (गां न) = इस पृथिवी के समान सब (चर्षणीसहम्) = मनुष्यों का सहन करनेवाले हैं— सबपर कृपा [mercy] करनेवाले हैं। भूमि माता के समान क्षमाशील हैं। ५. (वि-द्वेषणम्) = राग-द्वेष से रहित हैं [वि= रहित] ६. (संवननम्) = सब प्राणियों के लिए उचित सम्पत्ति का संविभाग करनेवाले हैं [विभक्तारम्] । ७. (उभयंकरम्) = अभ्युदय व नि: श्रेयस दोनों को सिद्ध करनेवाले हैं। ८. (मंहिष्ठम्) - दातृतम हैं – अनन्त दान देनेवाले हैं तथा ९. (उभयाविनम्) = दोनों लोकों में रक्षा करनेवाले हैं।

नोट – ‘उभयंकरम्' शब्द का अर्थ यह भी किया जा सकता है कि भविष्य में कर्मानुसार निग्रह व अनुग्रह दोनों के करनेवाले हैं। प्रभु 'शिव' हैं तो 'रुद्र' भी हैं ही । हाँ, यह तो ठीक है कि प्रभु का निग्रह भी जीव के हित के लिए ही है। उससे दी गयी तो मृत्यु भी अमृत का साधन ही है।
Essence
हम प्रभु का स्तवन करते हुए स्वयं भी कामादि को कुचलनेवाले बनें ।
Subject
किस प्रभु का शंसन