Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1356

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- प्रगाथः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त्व꣡मी꣢शिषे सु꣣ता꣢ना꣣मि꣢न्द्र꣣ त्व꣡मसु꣢꣯तानाम् । त्व꣢꣫ꣳ राजा꣣ ज꣡ना꣢नाम् ॥१३५६॥

त्वम् । ई꣣शिषे । सुता꣡ना꣢म् । इ꣡न्द्र꣢꣯ । त्वम् । अ꣡सु꣢꣯तानाम् । अ । सु꣣तानाम् । त्व꣢म् । रा꣡जा꣢꣯ । ज꣡ना꣢꣯नाम् ॥१३५६॥

Mantra without Swara
त्वमीशिषे सुतानामिन्द्र त्वमसुतानाम् । त्वꣳ राजा जनानाम् ॥

त्वम् । ईशिषे । सुतानाम् । इन्द्र । त्वम् । असुतानाम् । अ । सुतानाम् । त्वम् । राजा । जनानाम् ॥१३५६॥

Samveda - Mantra Number : 1356
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 11; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रगाथ प्रभु को उत्तर देता है— हे (इन्द्र) = परमैश्वर्य के स्वामिन्! मुझे कंजूस क्यों होना? यह धन मेरा थोड़े ही है (त्वम्) = आप ही (सुतानाम्) = उत्पन्न किये गये धनों के (ईशिषे) = ईश हैं, स्वामी हैं। हे इन्द्र ! (त्वम्) = आप ही (आसुतानाम्) = न उत्पन्न किये गये धनों के प्रभु हैं। जिन धनों को लोग 'रत्नाकरों' [समुद्रों] से अथवा वसुन्धरा के आकरों [mines] से निकाल लाये हैं, वे धन वस्तुत: आपके ही तो हैं । जिनको समुद्रों व आकरों से हम नहीं निकाल सके वे भी आपके हैं ही । निकाले हुए धन ‘सुत' हैं, न निकाले हुए 'असुत' हैं । हे प्रभो ! (त्वम्) = आप ही (जनानाम्) = सब प्राणियों के (राजा) = जीवनों को नियमित कर रहे हैं । मैं तो वस्तुत: कुछ हूँ ही नहीं, यह सब आपकी ही माया है, आपका ही खेल है, मुझे तो आपने निमित्तमात्र बनाया है, अतः इस कृपणता को आपने ही कुचलना है। 
Essence
कृपणता को कुचलने के लिए मैं इस तथ्य को स्मरण करूँ कि सब 'सुत' व 'असुत' धनों के स्वामी प्रभु ही हैं ।
Subject
सुतों व असुतों का ईश