Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1355

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- प्रगाथः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प꣣दा꣢ प꣣णी꣡न꣢रा꣣ध꣢सो꣣ नि꣡ बा꣢धस्व म꣣हा꣡ꣳ अ꣢सि । न꣢꣫ हि त्वा꣣ क꣢श्च꣣ न꣡ प्रति꣢꣯ ॥१३५५॥

पदा꣢ । प꣣णी꣢न् । अ꣣राध꣡सः꣢ । अ꣣ । राध꣡सः꣢ । नि । बा꣣धस्व । महा꣢न् । अ꣣सि । न꣢ । हि । त्वा꣣ । कः꣢ । च꣣ । न꣢ । प्र꣡ति꣢꣯ ॥१३५५॥

Mantra without Swara
पदा पणीनराधसो नि बाधस्व महाꣳ असि । न हि त्वा कश्च न प्रति ॥

पदा । पणीन् । अराधसः । अ । राधसः । नि । बाधस्व । महान् । असि । न । हि । त्वा । कः । च । न । प्रति ॥१३५५॥

Samveda - Mantra Number : 1355
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 11; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि ‘प्रागाथ' प्रभु का प्रकृष्ट गायन करनेवाला है । प्रभु अपने इस भक्त से कहते हैं कि (पणीन्) = कृपणों को, वणिक् वृत्तिवालों को, धर्म का वाणिज्य करनेवालों को (अराधसः) = वाणिज्य वृत्ति के कारण यज्ञ न करनेवालों को [not able to perform sacrifice] (पदा निबाधस्व) = पावों से पीड़ित कर, अर्थात् कृपणता व अयज्ञिय भावना को तू पाँवों तले कुचल डाल। ये वृत्तियाँ तुझे घृणित प्रतीत हों । (महान् असि) = तू तो उदार हृदय है, तेरे हृदय में स्वार्थपरता व लोभ के लिए स्थान नहीं है ।

ऐसा करने पर (कश्चन) = कोई भी (त्वा प्रति नहि) = तेरा मुक़ाबला न कर सकेगा। तेरा जीवन अद्वितीय सौन्दर्य को लिये हुए होगा । वस्तुत: जीवन में मालिन्य को लानेवाला कार्पण्य ही है इसे हमें अवश्य जीतना ही चाहिए । इस वृत्ति से हमें घृणा होनी चाहिए, इसलिए मन्त्र में इसे पाँवों तले रौंद देने को कहा है। घृणा उत्पन्न करने के लिए इससे अधिक सुन्दर और क्या कहा जा सकता है कि उसे पाँवों तले कुचल दिया जाए।
Essence
कृपणता को कुचल कर ही हम अपना कुशल कर सकते हैं ।
Subject
कृपणता को कुचलना