Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1351

1875 Mantra
Devata- आदित्यः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
य꣢द꣣द्य꣢꣫ सू꣣र उ꣢दि꣣ते꣡ऽना꣢गा मि꣣त्रो꣡ अ꣢र्य꣣मा꣢ । सु꣣वा꣡ति꣢ सवि꣣ता꣡ भगः꣢꣯ ॥१३५१॥

य꣢त् । अ꣣द्य । अ꣢ । द्य꣣ । सू꣡रे꣢꣯ । उ꣡दि꣢꣯ते । उत् । इ꣣ते । अ꣡ना꣢꣯गाः । अन् । आ꣣गाः । मि꣣त्रः꣢ । मि꣣ । त्रः꣢ । अ꣡र्यमा꣢ । सु꣣वा꣡ति꣢ । स꣣विता꣢ । भ꣡गः꣢꣯ ॥१३५१॥

Mantra without Swara
यदद्य सूर उदितेऽनागा मित्रो अर्यमा । सुवाति सविता भगः ॥

यत् । अद्य । अ । द्य । सूरे । उदिते । उत् । इते । अनागाः । अन् । आगाः । मित्रः । मि । त्रः । अर्यमा । सुवाति । सविता । भगः ॥१३५१॥

Samveda - Mantra Number : 1351
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 11; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि 'प्राणापान' की साधना करनेवाला 'मैत्रावरुणि' सब इन्द्रियों का वशी अथवा उत्तम निवासवाला ‘वसिष्ठ' है। वह अपने मित्रों से कहता है— आज प्रभु की कितनी कृपा हो जाए (यत्) = यदि (अद्य) = आज सूरे (उदिते) = सूर्योदय के होते ही (अनागाः) = निष्पाप – अपापविद्ध– जिसे कभी कोई पाप छू नहीं गया (मित्र:) = जो सबके साथ स्नेह करनेवाला है [जिमिदा स्नेहने] जो मृत्यु से व पाप से बचाता है [प्रमीते: त्रायते] (अर्यमा) = जो सब-कुछ देता है [अर्यमेति तमाहुर्यो ददाति] (सविता) = जो सब ऐश्वर्यों से सम्पन्न है तथा सब उत्तमताओं को जन्म देनेवाला है वह प्रभु हमारे अन्दर भी (भग:) = [भगं] (सुवाति) = समग्र ऐश्वर्य, वीर्य, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्यरूप भग को जन्म दे दे।

मन्त्र की भावना स्पष्ट है कि हम सूर्योदय के साथ ही 'अनागाः, मित्र, अर्यमा, व सविता' नामोंवाले प्रभु का चिन्तन करें, उससे प्रेरणा प्राप्त करें और अपने जीवन में षड्विध भग के उदय करनेवाले बनें ।
Essence
भावार्थ – हम भी प्रभु-स्मरण करते हुए निष्पाप, स्नेही, देनेवाले तथा ऐश्वर्य सम्पादन करनेवाले बनें। सूर्योदय के साथ हमारे जीवनों में भी ‘भग' का उदय हो ।
 
Subject
सूर्योदय के साथ ही