Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1350

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣡ग्ने꣢ सु꣣ख꣡त꣢मे꣣ र꣡थे꣢ दे꣣वा꣡ꣳ ई꣢डि꣣त꣡ आ व꣢꣯ह । अ꣢सि꣣ हो꣢ता꣣ म꣡नु꣢र्हितः ॥१३५०॥

अ꣡ग्ने꣢꣯ । सु꣣ख꣡त꣢मे । सु꣣ । ख꣡त꣢꣯मे । र꣡थे꣢꣯ । दे꣣वा꣢न् । ई꣣डितः꣢ । आ । व꣣ह । अ꣡सि꣢꣯ । हो꣡ता꣢꣯ । म꣡नु꣢꣯र्हितः । म꣡नुः꣢꣯ । हि꣡तः ॥१३५०॥

Mantra without Swara
अग्ने सुखतमे रथे देवाꣳ ईडित आ वह । असि होता मनुर्हितः ॥

अग्ने । सुखतमे । सु । खतमे । रथे । देवान् । ईडितः । आ । वह । असि । होता । मनुर्हितः । मनुः । हितः ॥१३५०॥

Samveda - Mantra Number : 1350
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 11; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
उल्लिखित यज्ञों का परिणाम यह होता है कि हमारी एक-एक इन्द्रिय [ख] उत्तम बनती [सु] है और हमारा यह शरीर सचमुच जीवन-यात्रा का साधक होने से 'रथ' कहलाने के योग्य होता है। इस शरीर में मेधातिथि प्रभु का स्तवन करता है और प्रभु से प्रार्थना करता है—(अग्ने) = हे मेरे रथ के अग्रेणी ! आप (ईडितः) = स्तुति किये जाकर (सुखतमे रथे) = हमारे इस शरीररूप रथ में जिसमें एक-एक इन्द्रिय [ख] अत्यन्त उत्तम [सु] बनी है, उस रथ में (देवान्) = दिव्य गुणों को (आवह) = समन्तात् प्राप्त कराइए, अर्थात् हम सब जगह से दिव्यता को ही ग्रहण करनेवाले बनें । हे प्रभो ! आप (होता असि) = सब उत्तमताओं के देनेवाले हैं (मनुः) = सब कुछ जानते हैं और (हितः) = मेरा अधिक-से-अधिक हित चाहने व करनेवाले हैं [benevolent and beneficent]।
Essence
हमारा शरीर रथ हो, एक-एक इन्द्रिय उत्तम हो, हम दिव्यता का वहन करें ।
Subject
सुखतम रथ में दिव्यता का वहन