Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 135

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- कण्वो घौरः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
इ꣣हे꣡व꣢ शृण्व एषां꣣ क꣢शा꣣ ह꣡स्ते꣢षु꣣ य꣡द्वदा꣢꣯न् । नि꣡ यामं꣢꣯ चि꣣त्र꣡मृ꣢ञ्जते ॥१३५॥

इ꣣ह꣢ । इ꣣व । शृण्वे । एषाम् । क꣡शाः꣢꣯ । ह꣡स्ते꣢꣯षु । यत् । व꣡दा꣢꣯न् । नि । या꣡म꣢꣯न् । चि꣣त्र꣢म् । ऋ꣣ञ्जते ॥१३५॥

Mantra without Swara
इहेव शृण्व एषां कशा हस्तेषु यद्वदान् । नि यामं चित्रमृञ्जते ॥

इह । इव । शृण्वे । एषाम् । कशाः । हस्तेषु । यत् । वदान् । नि । यामन् । चित्रम् । ऋञ्जते ॥१३५॥

Samveda - Mantra Number : 135
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हम सब प्रभु से प्रार्थना करते हैं। कुछ की प्रार्थना सुनी जाती है, कुछ की नहीं। हमने गत मन्त्रों में तीन दीप्तियों के लिए प्रार्थना की थी। कुछ को ये प्राप्त हैं, कुछ को नहीं। यह क्यों? इस प्रश्न का उत्तर बड़े सुन्दर शब्दों में यहाँ इस इस प्रकार दिया गया हैं कि (इह एव) = यहाँ ही (एषाम्) = इनकी बात (शृण्वे) = सुनी जाती है (यत्) = जब (कशा) = वाणी (हस्तेषु)  हाथों में (वदान्) =  बोलती है, अर्थात जब ये जैसा कहते हैं वैसा करते हैं, वचन के अनुसार क्रिया होने पर प्रार्थना सुनी जाती है, अन्यथा नहीं। ('यद्वाचा वदति तत् कर्मणा करोति') इन शब्दों में हमारी वाणी और कर्म का समन्वय होना चाहिए, तभी प्रभु हमारी प्रार्थना सुनेंगे और हम इसी जीवन में उन्नत होकर लक्ष्य स्थान पर पहुँच जाएँगे। एक टन उपदेश से एक औंस उदाहरण कहीं अधिक प्रभावशाली होता है। शास्त्रों में भी क्रियावान् को ही पण्डित माना गया है। (‘शास्त्राण्यधीत्यापि भवन्ति मूर्खा:') = शास्त्रों को पढ़कर भी मूर्ख होते ही हैं। 'कहना कुछ, करना कुछ' यही मूर्खता है।

, एवं, जिनकी वाणी हाथों में बोलती है अर्थात् जो क्रियाशील हैं, वे लोग ही (यामन्) = इस जीवन-यात्रा के मार्ग को (चित्रम्) = बड़े अद्भुत प्रकार से बड़ी सुन्दरता से (निऋञ्जते) = निश्चय से अलंकृत करते हैं। शास्त्रानुकूल आचरण से जीवन का सुन्दर बन जाना स्वाभाविक है। कण-कण करके-थोड़ा-थोड़ा करके - उसने इस जीवन को उत्कृष्ट बनाया है, अतः इसका नाम ‘कण्व’ हो गया है। यह कण्व घोरपुत्र अति घोर अर्थात् बहुत उत्कृष्ट जीवनवाला [घोर=noble] है।
Essence
जो कहें, वह करें। हमारे आगम व प्रयोग में समानता हो । कथनी व करनी में समता ही उच्च जीवन का लक्षण हैं। जैसा बोलूँ, वैसा करूँ।
Subject
कहना- करना