Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1348

1875 Mantra
Devata- तनूनपात् Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
म꣡धु꣢मन्तं तनूनपाद्य꣣ज्ञं꣢ दे꣣वे꣡षु꣢ नः कवे । अ꣣द्या꣡ कृ꣢णुह्यू꣣त꣡ये꣢ ॥१३४८॥

म꣡धु꣢꣯मन्तम् । त꣣नूनपात् । तनू । नपात् । यज्ञ꣢म् । दे꣣वे꣡षु꣢ । नः꣣ । कवे । अ꣡द्य꣢ । अ꣣ । द्य꣢ । कृ꣣णुहि । ऊत꣡ये꣢ ॥१३४८॥

Mantra without Swara
मधुमन्तं तनूनपाद्यज्ञं देवेषु नः कवे । अद्या कृणुह्यूतये ॥

मधुमन्तम् । तनूनपात् । तनू । नपात् । यज्ञम् । देवेषु । नः । कवे । अद्य । अ । द्य । कृणुहि । ऊतये ॥१३४८॥

Samveda - Mantra Number : 1348
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 11; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (कवे) = क्रान्तदर्शिन् ! वेदज्ञान द्वारा सब विद्याओं का उपदेश देनेवाले प्रभो ! (तनूनपात्) = शरीर को नष्ट न होने देनेवाले प्रभो ! [प्रभु-स्मरण से आचार-विचार की पवित्रता के द्वारा दीर्घायुष्य प्राप्त होता है।] आप (अद्य) = आज ही, अर्थात् (अविलम्ब) = बिना किसी देर के (नः ऊतये) = हमारी रक्षा के लिए, अशुभ विचारों और व्यवहारों से बचाने के लिए हमें (देवेषु) = विद्वानों के सम्पर्क में (मधुमन्तं यज्ञम्) = मधुवाले ज्ञानयज्ञ को (कृणुहि) = सिद्ध कीजिए ।

'विज्ञान का अध्ययन करते हुए प्रभु की महिमा का स्मरण कर ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति होती है, और यह ब्रह्मज्ञान व ब्रह्म का ध्यान हमारे जीवनों को पवित्र व मधुर बना देता है 'ये ही यज्ञ 'मधुमान् यज्ञ' कहलाते हैं । प्रभुकृपा से देवों के सम्पर्क में ये यज्ञ हमारे जीवनों में सदा चलते रहें जिससे हम आसुर वृत्तियों के आक्रमण से बचे रहें ।
Essence
प्रभु हमें विद्वानों का सम्पर्क प्राप्त कराएँ — उनके सम्पर्क में हम सदा ज्ञान-विज्ञान की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील हों ।
Subject
मधुमान् यज्ञ