Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1345

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
य꣢꣫त्सानोः꣣ सा꣡न्वारु꣢꣯हो꣣ भू꣡र्यस्प꣢꣯ष्ट꣣ क꣡र्त्व꣢म् । त꣢꣫दिन्द्रो꣣ अ꣡र्थं꣢ चेतति यू꣣थे꣡न꣢ वृ꣣ष्णि꣡रे꣢जति ॥१३४५॥

य꣢त् । सा꣡नोः꣢꣯ । सा꣡नु꣢꣯ । आ꣡रु꣢꣯हः । आ꣣ । अ꣡रुहः꣢꣯ । भू꣡रि꣢꣯ । अ꣡स्प꣢꣯ष्ट । क꣡र्त्व꣢꣯म् । तत् । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । अ꣡र्थ꣢꣯म् । चे꣣तति । यूथे꣡न꣢ । वृ꣣ष्णिः꣢ । ए꣣जति ॥१३४५॥

Mantra without Swara
यत्सानोः सान्वारुहो भूर्यस्पष्ट कर्त्वम् । तदिन्द्रो अर्थं चेतति यूथेन वृष्णिरेजति ॥

यत् । सानोः । सानु । आरुहः । आ । अरुहः । भूरि । अस्पष्ट । कर्त्वम् । तत् । इन्द्रः । अर्थम् । चेतति । यूथेन । वृष्णिः । एजति ॥१३४५॥

Samveda - Mantra Number : 1345
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 12;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
उन्नति के मार्ग पर आगे और आगे बढ़ता हुआ १. (यत्) = जब यह साधक (सानो: सानु आरुहः) = एक पर्वत शिखर से अगले पर्वत शिखर पर चढ़ता है, अर्थात् जब योग की एक भूमिका से अगली भूमिका में प्रवेश करता है तब २. यह (कर्त्वम्) = अपने कर्त्तव्य को (भूरि अस्पष्ट) = खूब ही स्पष्ट रूप से देखता है [स्पश् to see, behold, perceive] । हम जितना-जितना साधना के मार्ग पर आगे बढ़ते चलेंगे उतना ही हमें अपना कर्त्तव्य-पथ स्पष्ट दिखेगा । ३. (तत्) = तभी (इन्द्रः) = यह इन्द्रियवृत्तियों को आत्मवश्य करनेवाला आत्मा (अर्थम्) = वस्तुतत्त्व को (चेतति) = ठीक-ठीक जानता है । संसार की वास्तविकता को समझने के लिए भी योगमार्ग पर चलना आवश्यक है। इस मार्ग पर चले बिना हम आत्मा और अनात्मा के, अशुचि व शुचि के, अनित्य व नित्य के और सुख व दु:ख के स्वरूप में

विवेक नहीं कर पाते । ४. इस वस्तुतत्त्व को जानकर यह साधक (वृष्णिः) = शक्तिशाली होता हुआ तथा सबपर सुखों की वर्षा करनेवाला बनकर (यूथेन) = जनसमूह के साथ ही (एजति) = गतिवाला होता है । यह लोगों से दूर भागने का विचार नहीं करता । लोगों में ही रहता हुआ उनके अज्ञान व दुःख को करने के लिए यत्नशील होता है।

सबके लिए माधुर्यमय इच्छाओंवाला यह 'मधुच्छन्दाः' सबका मित्र ‘वैश्वामित्र' होता है। यह केवल अपने ही हित को नहीं चाहता।
Essence
हम योग की भूमिकाओं में आगे और आगे बढ़ें, अपने कर्त्तव्य को अधिक स्पष्ट रूप में देखें, वस्तुतत्त्व को पहचानें और शक्तिशाली बनकर जनसमूह के साथ ही रहते हुए उन्हें उन्नत करें ।
 
Subject
सानु से सानु पर आरोहण