Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1339

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- त्रिशोकः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
बृ꣣ह꣢꣫न्निदि꣣ध्म꣡ ए꣢षां꣣ भू꣡रि꣢ श꣣स्त्रं꣢ पृ꣣थुः꣡ स्वरुः꣢꣯ । ये꣢षा꣣मि꣢न्द्रो꣣ यु꣢वा꣣ स꣡खा꣢ ॥१३३९॥

बृह꣢न् । इत् । इ꣣ध्मः꣢ । ए꣣षाम् । भू꣡रि꣢꣯ । श꣣स्त्र꣢म् । पृ꣣थुः꣢ । स्व꣡रुः꣢꣯ । ये꣡षा꣢꣯म् । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । यु꣡वा꣢꣯ । स꣡खा꣢꣯ । स । खा꣣ ॥१३३९॥

Mantra without Swara
बृहन्निदिध्म एषां भूरि शस्त्रं पृथुः स्वरुः । येषामिन्द्रो युवा सखा ॥

बृहन् । इत् । इध्मः । एषाम् । भूरि । शस्त्रम् । पृथुः । स्वरुः । येषाम् । इन्द्रः । युवा । सखा । स । खा ॥१३३९॥

Samveda - Mantra Number : 1339
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 12;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(येषाम्) = जिनका (इन्द्रः) = सब ऐश्वर्यों का प्रभु और सब शत्रुओं का विदारण करनेवाला परमात्मा (युवा) = शुभ से संपृक्त करनेवाला और अशुभ से पृथक् करनेवाला (सखा) = मित्र है, १. (एषाम्) = इनकी (इध्मः) = ज्ञान की दीप्ति (इत्)= सचमुच (बृहन्) = विशाल होती है अथवा सदा वृद्धि को प्राप्त होनेवाली होती है। २. इनका (शस्त्रम्) = [स्तोत्र] प्रभु-स्तवन (भूरि) = [भृ=धारण-पोषण] धारण व पोषण करनेवाला होता है। यह प्रभु का स्तवन करता है और इससे उसे शक्ति प्राप्त होती है । ३. इनका (स्वरु:) = त्याग [Sacrifice] (पृथु:) = विशाल होता है। प्रभु की मित्रता प्राप्त होने पर अन्य सब वस्तुएँ इतनी तुच्छ हो जाती हैं कि वह इनमें फँसता नहीं, इनके त्याग में आनन्द का अनुभव करता है । इस प्रकार प्रभु की मित्रता इसमें ‘ज्ञान, स्तवन व त्याग' की भावना उत्पन्न करके इसे 'त्रिशोक' बना देती है । यह ज्ञान, स्तुति व त्याग से संसार में चमकता है ।
Essence
मैं ज्ञानी बनूँ, प्रभु का स्तोता बनूँ, और त्याग की वृत्तिवाला होऊँ।
Subject
‘ज्ञान, स्तवन, त्याग'