Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1337

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अहमीयुराङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣡र्षा꣢ नः सोम꣣ शं꣡ गवे꣢꣯ धु꣣क्ष꣡स्व꣢ पि꣣प्यु꣢षी꣣मि꣡ष꣢म् । व꣡र्धा꣢ स꣣मु꣡द्र꣢मुक्थ्य ॥१३३७॥

अ꣡र्ष꣢꣯ । नः꣣ । सोम । श꣢म् । ग꣡वे꣢꣯ । धु꣣क्ष꣡स्व꣢ । पि꣣प्यु꣡षी꣢म् । इ꣡ष꣢꣯म् । व꣡र्ध꣢꣯ । स꣡मुद्र꣢म् । स꣣म् । उ꣢द्रम् । उ꣣क्थ्य ॥१३३७॥

Mantra without Swara
अर्षा नः सोम शं गवे धुक्षस्व पिप्युषीमिषम् । वर्धा समुद्रमुक्थ्य ॥

अर्ष । नः । सोम । शम् । गवे । धुक्षस्व । पिप्युषीम् । इषम् । वर्ध । समुद्रम् । सम् । उद्रम् । उक्थ्य ॥१३३७॥

Samveda - Mantra Number : 1337
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 11;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
'अमहीयु: ' = मही को - पार्थिव भोगों को न चाहनेवाला प्रभु से प्रार्थना करता है—१. हे (सोम) = शान्त प्रभो ! (नः) =हमें (अर्ष) = प्राप्त होओ । २. (शं गवे) = हमारे ज्ञानेन्द्रियों व कर्मेन्द्रियों को शान्ति प्राप्त कराइए ३. (पिप्युषीम्) = वृद्धि की कारणूभत (इषम्) = प्रेरणा को (धुक्षस्व) = हममें भर दीजिए। हमें वह प्रेरणा प्राप्त कराइए, जिसे प्राप्त करके हम और आगे बढ़ते चलें, सदा उन्नति के मार्ग पर अग्रसर हों । ४. हे (उक्थ्य) = ऊँचे स्वर से गाने योग्य स्तोत्रों से स्तूयमान प्रभो ! (नः) = हमारे (समुद्रम्) = ज्ञान के समुद्र को (वर्ध) = खूब बढ़ा दीजिए |
Essence
प्रभु कृपा से हमारी इन्द्रियाँ शान्त हों । हमें उन्नति के मार्ग पर बढ़ानेवाली प्रेरणा प्राप्त हो, तथा हमारे ज्ञानसमुद्र की वृद्धि हो ।
Subject
वृद्धि की कारणभूत प्रेरणा