Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1328

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- मनुराप्सवः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
आ꣡ नः꣢ सुतास इन्दवः पुना꣣ना꣡ धा꣢वता र꣣यि꣢म् । वृ꣣ष्टि꣡द्या꣢वो रीत्यापः स्व꣣र्वि꣡दः꣢ ॥१३२८॥

आ꣢ । नः꣣ । सुतासः । इन्दवः । पुनानाः꣢ । धा꣣वत । रयि꣢म् । वृ꣣ष्टि꣡द्या꣢वः । वृ꣣ष्टि꣢ । द्या꣣वः । रीत्यापः । रीति । आपः । स्वर्वि꣡दः꣢ । स्वः꣣ । वि꣡दः꣢꣯ ॥१३२८॥

Mantra without Swara
आ नः सुतास इन्दवः पुनाना धावता रयिम् । वृष्टिद्यावो रीत्यापः स्वर्विदः ॥

आ । नः । सुतासः । इन्दवः । पुनानाः । धावत । रयिम् । वृष्टिद्यावः । वृष्टि । द्यावः । रीत्यापः । रीति । आपः । स्वर्विदः । स्वः । विदः ॥१३२८॥

Samveda - Mantra Number : 1328
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 11;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (सुतासः इन्दवः) = उत्पन्न हुए-हुए सोम कणो ! तुम (नः) = हमें (पुनानाः) = पवित्र करते हुए (रयिम्) = ऐश्वर्य को (आधावत्) = समन्तात् प्राप्त कराओ। तुम्हारे द्वारा हमारा शरीर स्वस्थ हो, मन राग-द्वेषादि की वृत्तियों से शून्य हो तथा मस्तिष्क उज्वल बने । तुम (वृष्टिद्यावः) = धर्ममेघ समाधि में मस्तिष्करूप द्युलोक से आनन्दकणों के वर्षक हो। हे सोमकणो! तुम (रीत्याप:) = [अप्-कर्म, री=गतौ] कार्यों में व्यापृत करनेवाले हो, अपने पान करनेवाले को लोकहित के लिए क्रियाशील बनानेवाले हो तथा अन्त में (स्वर्विदः) = मोक्षरूप सुख प्राप्त करानेवाले हो । उस 'स्वर् ज्योति'=ब्रह्म को प्राप्त करने के लिए ‘सोमपान' ही एकमात्र साधन है। यह सोमपान मनुष्य के लिए स्वर्ज्योति तक पहुँचने का सोपान [सीढ़ी] बन जाता है ।
Essence
सोमपान के द्वारा हम 'क्रियावान् ब्रह्मवित्' बनें ।
Subject
क्रियावान् ब्रह्मवित्