Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1325

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त्व꣡ꣳ सु꣢ष्वा꣣णो꣡ अद्रि꣢꣯भिर꣣꣬भ्य꣢꣯र्ष꣣ क꣡नि꣢क्रदत् । द्यु꣣म꣢न्त꣣ꣳ शु꣢ष्म꣣मा꣡ भ꣢र ॥१३२५॥

त्व꣢म् । सु꣣ष्वाणः꣢ । अ꣡द्रि꣢꣯भिः । अ । द्रि꣣भिः । अभि꣢ । अ꣣र्ष । क꣡नि꣢꣯क्रदत् । द्यु꣣म꣡न्त꣢म् । शु꣡ष्म꣢꣯म् । आ । भ꣣र ॥१३२५॥

Mantra without Swara
त्वꣳ सुष्वाणो अद्रिभिरभ्यर्ष कनिक्रदत् । द्युमन्तꣳ शुष्ममा भर ॥

त्वम् । सुष्वाणः । अद्रिभिः । अ । द्रिभिः । अभि । अर्ष । कनिक्रदत् । द्युमन्तम् । शुष्मम् । आ । भर ॥१३२५॥

Samveda - Mantra Number : 1325
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 11;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
'भारद्वाज बार्हस्पत्य' कैसे बनता है ? इस प्रश्न का उत्तर प्रभु इन शब्दों में देते हैं—१. (त्वं अद्रिभिः) =[अद्रयः आदरणीयाः – नि० ९.८] आदरणीय माता-पिता व आचार्यों से तथा विद्वान् अतिथियों से (सुष्वाण:) = सदा उत्तम प्रेरणा प्राप्त करनेवाला हो । वस्तुत: जिस भी व्यक्ति को माता की उत्तम प्रेरणा प्राप्त होती है वही अपने जीवन को आदर्श ज्ञान व बल से युक्त कर पाता है । २. (कनिक्रदत्) = निरन्तर उस प्रभु का आह्वान करते हुए तू (अभ्यर्ष) = समन्तात् कार्यों में गतिवाला हो । इस प्रकार उत्तम प्रेरणा को प्राप्त होकर प्रभु स्मरणपूर्वक क्रियाओं में लगे रहने से तू ३. (द्युमन्तं शुष्मम्) = ज्योतिर्मय बल को अपने अन्दर (आभर) = समन्तात् भर ले । ज्योति को भरकर तू बार्हस्पत्य बनता है तो शक्ति सञ्चार के द्वारा भरद्वाज होता है ।
Essence
बड़ों से प्राप्त प्रेरणा व प्रभु-स्मरण हमें 'भरद्वाज बार्हस्पत्य' बनानेवाले हों ।
 
Subject
ज्योतिर्मय शक्ति