Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1323

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त्व꣡ꣳ सो꣢मासि धार꣣यु꣢र्म꣣न्द्र꣡ ओजि꣢꣯ष्ठो अध्व꣣रे꣢ । प꣡व꣢स्व मꣳह꣣य꣡द्र꣢यिः ॥१३२३॥

त्व꣢म् । सो꣣म । असि । धारयुः꣢ । म꣣न्द्रः꣢ । ओ꣡जि꣢꣯ष्ठः । अ꣣ध्वरे꣢ । प꣡व꣢꣯स्व । म꣣ꣳहय꣡द्र꣢यिः । म꣣ꣳहय꣢त् । र꣣यिः ॥१३२३॥

Mantra without Swara
त्वꣳ सोमासि धारयुर्मन्द्र ओजिष्ठो अध्वरे । पवस्व मꣳहयद्रयिः ॥

त्वम् । सोम । असि । धारयुः । मन्द्रः । ओजिष्ठः । अध्वरे । पवस्व । मꣳहयद्रयिः । मꣳहयत् । रयिः ॥१३२३॥

Samveda - Mantra Number : 1323
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 11;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
'भरद्वाज' अपने अन्दर शक्ति भरनेवाले और 'बार्हस्पत्य' ज्ञानी से प्रभु कहते हैं कि १. (त्वम्) = तू हे (सोम) = शान्तस्वभाव पुरुष ! (धारयुः) = [धारा=वाङ्] वाणी की कामनावाला (असि) = है । तू सदा ज्ञान की कामनावाला होकर सतत वेदवाणी का अध्ययन कर । २. (मन्द्रः) = तू सदा प्रसन्न मनवाला बन । ३. (ओजिष्ठः) = अत्यन्त शक्तिशाली हो । ४. (अध्वरे) = यज्ञों में लगा हुआ (पवस्व) = अपने जीवन को पवित्र बना । तथा ५. (मंहयद् रयिः) = धन का सदा दान देनेवाला बन । =

१. धन न देनेवाला २. यज्ञों में प्रवृत नहीं हो सकता । यज्ञों से दूर रहनेवाला व्यक्ति ३. विषयविलास की ओर जाकर शक्ति खो दाता है और कभी भी ओजिष्ठ नहीं बनता । ४. अन्ततः मानस आह्लाद भी इसे छोड़ जाता है और ५. 'यह ज्ञान की कामनावाला होगा' इस बात की तो सम्भावना ही नहीं रहती।
Essence
हम ज्ञान की कामनावाले हों, ओजिष्ठ बनें।
Subject
ज्ञान की कामना व ओजस्विता